गुण मिलान की पर्ची में जब भकूट के आगे शून्य लिखा आता है, तो घर में जो होता है वह सबको पता है। बातचीत रुक जाती है। कोई कहता है कि छत्तीस में से इतने गुण तो मिल गए, कोई कहता है भकूट शून्य है तो बाकी का क्या मतलब। और अक्सर एक ठीकठाक रिश्ता वहीं बंद हो जाता है।
मुझे इस पर लिखना ज़रूरी लगा क्योंकि भकूट के बारे में जो डर फैला है, वह उसके अपने वज़न से कहीं बड़ा है। शास्त्र ने इसे जितने अंक दिए हैं, और परिहार के जितने साफ़ नियम दिए हैं, दोनों बातें बहुत कम बताई जाती हैं।
भकूट है क्या, और उसका वज़न कितना है
अष्टकूट मिलान में आठ कूट होते हैं और कुल छत्तीस अंक। बँटवारा इस तरह है।
- नाड़ी, 8 अंक
- भकूट, 7 अंक
- गण, 6 अंक
- ग्रह मैत्री, 5 अंक
- योनि, 4 अंक
- तारा, 3 अंक
- वश्य, 2 अंक
- वर्ण, 1 अंक
भकूट दूसरे नंबर पर है, यानी भारी कूट है। और यही आँकड़ा दूसरी दिशा में भी पढ़ा जाना चाहिए। सात अंक छत्तीस का लगभग उन्नीस प्रतिशत है। भकूट पूरा गिर जाए तब भी उनतीस अंक बचते हैं।
गिनती होती कैसे है
भकूट पूरी तरह चंद्र राशियों की आपसी दूरी पर चलता है। वर और वधू की जन्म राशियाँ लीजिए, एक से दूसरी तक गिनिए, फिर दूसरी से पहली तक गिनिए। जो जोड़ी बनती है, वही भकूट तय करती है।
शून्य अंक तीन स्थितियों में मिलते हैं।
- 2 और 12, जिसे द्विर्द्वादश कहते हैं। यानी राशियाँ अगल बगल हों।
- 5 और 9, जिसे नवपंचम कहते हैं।
- 6 और 8, जिसे षडाष्टक कहते हैं।
बाकी सब स्थितियों में, यानी एक और एक, तीन और ग्यारह, चार और दस, तथा सात और सात, पूरे सात अंक मिल जाते हैं। इससे ज़्यादा जटिल कुछ नहीं है। भकूट में केवल राशि की दूरी देखी जाती है, ग्रह नहीं, भाव नहीं, दशा नहीं।
वह असंगति जो लगभग कोई नहीं बताता
अब उस बात पर आइए जो मुझे सबसे दिलचस्प लगती है। नवपंचम, यानी पाँच और नौ की दूरी, भकूट में शून्य देती है।
अब सोचिए कि ज्योतिष के बाकी हिस्सों में नवपंचम को क्या माना जाता है। पंचम और नवम त्रिकोण भाव हैं, और त्रिकोण संबंध को समूचे शास्त्र में सबसे शुभ संबंधों में गिना जाता है। ग्रहों के बीच नवपंचम संबंध हो तो उसे अनुकूल कहा जाता है। वही दूरी जब दो चंद्र राशियों के बीच आती है, तो भकूट उसे शून्य दे देता है।
यह विरोधाभास कोई गलती नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि भकूट कोई सर्वांगीण अनुकूलता नहीं माप रहा।
वह एक बहुत संकरी चीज़ माप रहा है, दो चंद्र राशियों के बीच की एक विशेष प्रकार की दूरी, और उसी संदर्भ में उसका उत्तर सीमित है। जिस औज़ार की परिभाषा ही संकरी हो, उससे पूरे जीवन का निर्णय लेना उस औज़ार के साथ अन्याय है।
परिहार: शास्त्र खुद इसे काटता है
यह हिस्सा सबसे कम पढ़ा जाता है और सबसे ज़्यादा काम का है। मुहूर्त परंपरा में भकूट दोष के परिहार, यानी उसके कट जाने के, स्पष्ट नियम दिए गए हैं। जो नियम सबसे व्यापक रूप से माने जाते हैं वे ये हैं।
- यदि दोनों राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो, तो भकूट दोष लागू नहीं होता। उदाहरण के लिए मेष और वृश्चिक दोनों के स्वामी मंगल हैं।
- यदि दोनों राशियों के स्वामी आपस में मित्र हों, तो भी दोष का बल गिर जाता है।
- कई परंपराएँ यह भी मानती हैं कि ग्रह मैत्री कूट के पूरे अंक मिल रहे हों तो भकूट का दोष स्वतः शांत हो जाता है।
इसके आगे परंपराओं में मतभेद है। कुछ ग्रंथ नक्षत्र की तारा गणना अनुकूल होने पर भी परिहार मानते हैं, कुछ नहीं। यह मतभेद असली है और मैं इसे ढँकना नहीं चाहता। जो बात लगभग सर्वसम्मत है वह यही दो नियम हैं, एक स्वामी या मित्र स्वामी।
व्यवहार में इसका असर बड़ा है। षडाष्टक की बहुत सी जोड़ियाँ, जैसे मेष और वृश्चिक, इसी नियम से कट जाती हैं। पर पर्ची पर केवल शून्य छपता है, परिहार नहीं छपता।
सबसे बड़ी गलतफहमी: भकूट शून्य यानी रिश्ता खारिज
यह वह गलती है जिसकी कीमत असली लोग चुकाते हैं। प्रचलित मानक यह है कि छत्तीस में से अठारह अंक मिल जाएँ तो मिलान स्वीकार्य माना जाता है। भकूट के पूरे सात अंक गिर जाने पर भी अधिकतम उनतीस बचते हैं, जो अठारह से काफ़ी ऊपर है।
यानी अकेला भकूट किसी मिलान को गणित के हिसाब से असफल नहीं करता। जो नियम इसे अपने आप खारिज कर देता है, वह अंकों की व्यवस्था से नहीं आ रहा। वह किसी की व्याख्या से आ रहा है, और अक्सर उसी व्याख्या के साथ एक उपाय का प्रस्ताव भी आता है।
गुण मिलान जिन चीज़ों को देखता ही नहीं
अष्टकूट का पूरा ढाँचा केवल दो सूचनाओं पर खड़ा है, चंद्र का नक्षत्र और चंद्र की राशि। बस। इसका मतलब यह है कि वह इन सबको नहीं देखता।
- लग्न और लग्नेश, यानी पूरा शरीर और स्वभाव।
- सप्तम भाव और उसका स्वामी, जो विवाह का सीधा भाव है। सप्तम भाव में गुरु और सप्तम भाव में शुक्र जैसी स्थितियाँ यहाँ बिलकुल अनुपस्थित रहती हैं।
- शुक्र और मंगल की स्थिति।
- दोनों की चल रही दशा और उनका आपसी समय।
यह देखकर साफ़ हो जाता है कि गुण मिलान एक छँटनी का औज़ार है, अंतिम निर्णय का नहीं। पुराने समय में जब बहुत सारे प्रस्ताव आते थे, यह तेज़ी से सूची छोटी करने का तरीका था। उसी को आज अंतिम फ़ैसले की तरह पढ़ा जा रहा है।
चंद्र राशि जितनी दिखती है उतनी सरल नहीं है
एक और बात जो कम कही जाती है। भकूट राशि की दूरी गिनता है, पर दो लोगों की एक ही चंद्र राशि होने पर भी उनका चंद्र बहुत अलग हो सकता है। नक्षत्र अलग हो सकता है, चरण अलग हो सकता है, चंद्र का बल और उसकी युति अलग हो सकती है।
कुंभ राशि का चंद्र इसका अच्छा उदाहरण है, जैसा कुंभ राशि के चंद्र वाले लेख में देखा जा सकता है। एक ही राशि के भीतर स्वभाव की काफ़ी चौड़ाई होती है। भकूट इस चौड़ाई को नहीं देखता, वह केवल राशि का क्रमांक देखता है। नक्षत्र आधारित मिलान की पूरी बनावट गुण मिलान वाले विस्तृत लेख में दी गई है।
इसे कैसे पढ़ा जाए, बिना डर के
मेरा सुझाव सीधा है। भकूट को एक संकेत की तरह लीजिए। शून्य आया है तो पहले परिहार जाँचिए, यानी दोनों राशियों के स्वामी देखिए। फिर देखिए कि कुल अंक कितने हैं और वे स्वीकार्य सीमा में हैं या नहीं। उसके बाद वे चीज़ें देखिए जिन्हें गुण मिलान छूता ही नहीं, यानी दोनों की पूरी कुंडली।
और एक बात साफ़ रहनी चाहिए। कोई कूट किसी विवाह के सफल या असफल होने की भविष्यवाणी नहीं करता। यह गणना का औज़ार है और इसकी सीमाएँ इसकी अपनी परिभाषा में लिखी हैं।
इस साइट पर कोई उपाय, कोई रत्न और कोई शुल्क वाला अनुष्ठान नहीं बेचा जाता, इसलिए मैं यह बिना किसी दबाव के कह सकता हूँ। यदि किसी ने आपसे भकूट के नाम पर पैसे माँगे हों, तो उससे परिहार के नियम पूछ लीजिए। अच्छा प्रश्न अक्सर पूरी बातचीत का रुख बदल देता है।
भकूट में कितने अंक होते हैं?
अष्टकूट के छत्तीस अंकों में भकूट को सात अंक मिले हैं। यह नाड़ी के आठ अंकों के बाद दूसरा सबसे भारी कूट है, और साथ ही कुल का लगभग उन्नीस प्रतिशत ही है।
भकूट में शून्य कब आता है?
तीन स्थितियों में। द्विर्द्वादश यानी दो और बारह, नवपंचम यानी पाँच और नौ, और षडाष्टक यानी छह और आठ। शेष सभी दूरियों में पूरे सात अंक मिल जाते हैं।
क्या भकूट दोष कट सकता है?
हाँ, और परिहार के नियम शास्त्र में ही दिए गए हैं। यदि दोनों राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो, या दोनों स्वामी आपस में मित्र हों, तो दोष लागू नहीं रहता। कई परंपराएँ ग्रह मैत्री के पूरे अंक मिलने पर भी परिहार मानती हैं।
क्या भकूट शून्य होने पर रिश्ता रोक देना चाहिए?
अंकों की व्यवस्था ऐसा नहीं कहती। प्रचलित मानक अठारह अंक का है, और भकूट के पूरे सात अंक गिरने पर भी अधिकतम उनतीस बचते हैं। अकेला भकूट किसी मिलान को गणित के हिसाब से असफल नहीं करता।
नवपंचम को शुभ भी कहा जाता है और भकूट में शून्य भी, ऐसा क्यों?
क्योंकि भकूट सर्वांगीण अनुकूलता नहीं माप रहा। वह दो चंद्र राशियों के बीच की एक विशेष दूरी माप रहा है। त्रिकोण संबंध बाकी शास्त्र में अनुकूल माना जाता है, और यही विरोधाभास बताता है कि भकूट का दायरा कितना संकरा है।
गुण मिलान किन चीज़ों को नहीं देखता?
वह केवल चंद्र के नक्षत्र और राशि पर चलता है। लग्न, लग्नेश, सप्तम भाव और उसका स्वामी, शुक्र और मंगल की स्थिति, और दोनों की चल रही दशा, इनमें से कुछ भी उसमें नहीं आता। इसीलिए यह छँटनी का औज़ार है, अंतिम निर्णय का आधार नहीं।

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