छठ के बारे में सबसे ज़्यादा भ्रम इसी बात का रहता है कि यह चार दिन का पर्व है, और हर दिन का नियम अलग है.
लोग एक ही नियम को चारों दिन पर चिपका देते हैं, फिर घर में बहस होती है कि नहाय-खाय के दिन प्याज़ चलेगा या नहीं, खरना के बाद पानी पिया जा सकता है या नहीं, और अर्घ्य किस दिशा में देना है. ये चारों सवाल अलग-अलग नियमों के हैं, एक ही नियम के नहीं.
मैं इंजीनियर हूँ, पेशेवर ज्योतिषी नहीं. मैं यहाँ जो कर रहा हूँ वह यह है कि व्रत-निर्णय की परंपरा जो कहती है उसे साफ़ भाषा में रख रहा हूँ, और जो तारीख़ मेरे अपने पंचांग इंजन से निकली है वही लिख रहा हूँ. जहाँ मेरे पास पक्की गणना नहीं है, वहाँ मैं लिख दूँगा कि नहीं है.
छठ की गिनती षष्ठी से पीछे की ओर होती है
यह वह बात है जिससे बाक़ी सब कुछ समझ में आ जाता है. छठ का केंद्र कार्तिक शुक्ल षष्ठी है. बाक़ी तीन दिन उसी से गिने जाते हैं, दो दिन पहले और एक दिन बाद. इसलिए पर्व का नाम भी षष्ठी से बना है, छठ.
2027 में कार्तिक शुक्ल षष्ठी, यानी संध्या अर्घ्य का दिन, 4 नवंबर 2027, गुरुवार है. यह तारीख़ साइट के अपने get_festival_dates इंजन से निकली है और तिथि से अलग से मिलाई गई है.
बाक़ी तीन दिन चतुर्थी, पंचमी और सप्तमी पर पड़ते हैं. इनकी कैलेंडर तारीख़ें मैं यहाँ अपने मन से नहीं लिख रहा, क्योंकि तिथि की लंबाई घटती-बढ़ती रहती है और एक छोटी तिथि पूरे क्रम को एक दिन खिसका सकती है.
मेरे पंचांग इंजन के हिसाब से 2027 में चतुर्थी 2 नवंबर, मंगलवार को पड़ती है, पंचमी 3 नवंबर, बुधवार को, और सप्तमी 5 नवंबर, शुक्रवार को. यानी नहाय-खाय 2 नवंबर को, खरना 3 नवंबर को, संध्या अर्घ्य 4 नवंबर को और उषा अर्घ्य-पारण 5 नवंबर को.
अगर आपको यह अजीब लगे कि मैं चार दिन के पर्व की चार तारीख़ें नहीं लिख रहा, तो यही इस साइट का पूरा तर्क है.
तिथि कोई दिन नहीं है, वह एक कोण है, और वह हर दिन अलग लंबाई की होती है. इस बात को मैंने मकर संक्रांति की गणना वाले लेख में विस्तार से खोला है, जहाँ यही खिसकाव सौर पक्ष से आता है.
दिन एक: नहाय-खाय, जहाँ शुद्धता का नियम शुरू होता है
पहला दिन चतुर्थी को पड़ता है. इस दिन का नियम व्रत का नहीं है, रसोई का है. व्रती नदी या तालाब में स्नान करती हैं, घर की रसोई को पूरी तरह अलग कर देती हैं, और उसी दिन से नया चूल्हा या मिट्टी का चूल्हा इस्तेमाल में आता है.
खाना एक बार होता है और सात्विक होता है. लौकी की सब्ज़ी, अरवा चावल, चने की दाल. सेंधा नमक चलता है, साधारण नमक नहीं. प्याज़ और लहसुन इस दिन से लेकर पारण तक घर में नहीं आते.
यहाँ जो असली चीज़ हो रही है वह भूख नहीं है. यह पूरे घर को एक अलग व्यवस्था में डालना है, जिसमें अगले तीन दिन तक व्रती को कोई निर्णय न लेना पड़े. जो लोग पहली बार छठ कर रहे होते हैं वे अक्सर यही चूक जाते हैं और तीसरे दिन थक कर टूट जाते हैं.
दिन दो: खरना, और वह क्षण जब निर्जला शुरू होता है
दूसरा दिन पंचमी को है. व्रती दिन भर उपवास रखती हैं और सूर्यास्त के बाद एक बार खाती हैं. यही एक बार का भोजन खरना कहलाता है. गुड़ की खीर, रोटी, और केला.
खरना का जो हिस्सा लोग सबसे ज़्यादा हल्के में लेते हैं वह यह है कि खरना का भोजन ख़त्म होते ही निर्जला व्रत शुरू हो जाता है. उसके बाद अगले दिन के उषा अर्घ्य और पारण तक पानी भी नहीं. यानी व्रत की सबसे कठिन अवधि खरना की थाली उठने के क्षण से गिनी जाती है, अगली सुबह से नहीं. लगभग छत्तीस घंटे.
इसीलिए खरना के भोजन में गुड़ और चावल का होना कोई सजावट नहीं है. वह धीमी ऊर्जा है जो अगले डेढ़ दिन चलनी है.
दिन तीन: संध्या अर्घ्य, 4 नवंबर 2027
यह पर्व का केंद्र है. षष्ठी की शाम को व्रती और परिवार नदी, तालाब या घर के बने कृत्रिम जलाशय में उतरते हैं, और अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देते हैं. सूप में ठेकुआ, गन्ना, नारियल, हल्दी और अदरक की गाँठें, मौसमी फल.
व्रती कमर तक पानी में खड़ी होती हैं, पश्चिम की ओर मुँह करके, और दूध तथा जल का अर्घ्य देती हैं. कोई पुरोहित ज़रूरी नहीं है. छठ उन गिने-चुने बड़े व्रतों में है जिसमें पूरी विधि व्रती स्वयं करती हैं, बिना किसी बिचौलिये के.
यही बात मुझे इस पर्व में सबसे साफ़ लगती है. जहाँ बाक़ी जगह डर बेचा जाता है और उसका इलाज बेचा जाता है, वहाँ छठ में न कोई शुल्क है, न कोई रत्न, न कोई अनुष्ठान जो किसी और से करवाना पड़े.
दिन चार: उषा अर्घ्य और पारण
सप्तमी की सुबह वही परिवार फिर उसी घाट पर लौटता है, इस बार उगते सूर्य के लिए, पूर्व की ओर मुँह करके. अर्घ्य के बाद व्रती प्रसाद और जल लेकर पारण करती हैं, और तभी छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत टूटता है.
एक छोटी बात जो अक्सर छूट जाती है: उषा अर्घ्य का समय सूर्योदय से बँधा है, और सूर्योदय हर शहर में अलग होता है. पटना और दिल्ली के सूर्योदय में लगभग आधे घंटे का अंतर रहता है. इसलिए अख़बार में छपा समय अपने शहर का है या नहीं, यह देख लेना चाहिए.
वह भूल जो लगभग हर जगह दोहराई जाती है
सबसे आम भूल यह है कि लोग कहते हैं, अस्त होते सूर्य की पूजा अशुभ मानी जाती है, इसलिए छठ का संध्या अर्घ्य कोई अपवाद है या किसी कथा की भरपाई है.
व्रत-निर्णय की परंपरा ऐसा कुछ नहीं कहती. निर्णय सिंधु जैसे ग्रंथ जिस चीज़ पर टिकते हैं वह यह है कि कौन सी तिथि किस काल में व्याप्त है.
सूर्य ऊपर जा रहा है या नीचे, इसका इस निर्णय में कोई स्थान नहीं है. सूर्य ज्योतिष में आत्मा और अधिकार का कारक है, और वह अस्त होते समय अपना कारकत्व नहीं खोता.
दिन का जो हिस्सा ज्योतिषीय रूप से कमज़ोर माना जाता है वह गोधूलि के आसपास का संधिकाल है, जिसकी अपनी अलग परिभाषा है. अस्तकाल स्वयं में उस श्रेणी में नहीं आता, और वह किसी पूजा को अशुभ नहीं बनाता.
दूसरी भूल यह है कि अर्घ्य किसी डर से दिया जा रहा है. छठ का मूल भाव धन्यवाद है, माँग नहीं. पूरे विधान में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि अर्घ्य छूट जाने से कोई हानि होगी.
दो पंचांग आपस में क्यों नहीं मिलते
यह वही तकनीकी बात है जो हर बड़े पर्व पर लौटती है. छठ के लिए षष्ठी उस दिन ली जाती है जिस दिन वह संध्याकाल में व्याप्त हो, क्योंकि मुख्य अर्घ्य शाम का है. ज़्यादातर दूसरे व्रतों में तिथि सूर्योदय के समय देखी जाती है.
यानी छठ का निर्णय-नियम सामान्य नियम से अलग है. यही वजह है कि जिस साल षष्ठी दोपहर में शुरू होकर अगले दिन दोपहर में ख़त्म होती है, उस साल दो पंचांग दो अलग दिन छाप सकते हैं और दोनों अपने-अपने नियम से सही हो सकते हैं.
यह संध्या-व्याप्ति वाला सिद्धांत व्रत-निर्णय की परंपरा में आमतौर पर माना जाता है, लेकिन निर्णय सिंधु के ठीक किस प्रकरण या श्लोक में यह दर्ज है, इसका पक्का संदर्भ मुझे शोध में नहीं मिला.
इसलिए मैं यहाँ कोई गढ़ा हुआ हवाला नहीं दे रहा, और जिसे यह पंक्ति-दर-पंक्ति चाहिए वह किसी मान्य संस्कृत विद्वान या अपने पारिवारिक पुरोहित से पुष्टि करा ले.
तिथि की लंबाई क्यों बदलती है, इसका पूरा गणित मैंने अलग से लिखा है. होली की तारीख़ पर भी यही झगड़ा हर साल होता है, और कारण एक ही है.
ज्योतिष इस व्रत को कैसे पढ़ता है
अगर आप कुंडली के नज़रिये से देखना चाहें तो छठ सूर्य का व्रत है, और सूर्य कुंडली में आत्मबल, पिता, अधिकार और स्वास्थ्य का कारक है. जिनकी कुंडली में सूर्य कमज़ोर स्थिति में है, उनके लिए यह व्रत कोई इलाज नहीं है, और मैं ऐसा दावा नहीं करूँगा. यह अनुशासन का अभ्यास है, और अनुशासन का असर अपनी जगह अलग होता है.
इसी तरह अगर आप साढ़ेसाती से गुज़र रहे हैं, तो छठ करने से शनि का गोचर नहीं बदलेगा. गोचर खगोलीय है और वह अपने समय पर चलेगा. जो बदल सकता है वह यह है कि उस दौर में आप किस दिनचर्या के साथ खड़े हैं.
कुंडली में सूर्य कहाँ बैठा है और किन ग्रहों से जुड़ा है, यह देखने के लिए किसी पर्व की ज़रूरत नहीं है. वह गणना कभी भी की जा सकती है, और वही करना इस साइट का काम है.
छठ पूजा 2027 में कब है?
छठ का मुख्य दिन, यानी संध्या अर्घ्य, 4 नवंबर 2027, गुरुवार को है. उस दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी है. यह तारीख़ साइट के पंचांग इंजन से निकाली गई है और तिथि से अलग से मिलाई गई है.
क्या छठ के चारों दिन एक ही नियम चलता है?
नहीं. पहले दिन नहाय-खाय में एक बार सात्विक भोजन होता है, दूसरे दिन खरना में सूर्यास्त के बाद एक बार, और उसके तुरंत बाद निर्जला व्रत शुरू हो जाता है जो चौथे दिन पारण तक चलता है. तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन उषा अर्घ्य होता है.
निर्जला व्रत कब से शुरू होता है?
खरना का भोजन समाप्त होते ही, यानी दूसरे दिन सूर्यास्त के बाद. यह अगले दिन के उषा अर्घ्य और पारण तक चलता है, लगभग छत्तीस घंटे. बहुत लोग इसे तीसरे दिन की सुबह से गिनते हैं, जो ग़लत है.
क्या अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देना अशुभ है?
व्रत-निर्णय की परंपरा में ऐसा कोई नियम नहीं मिलता. निर्णय तिथि की व्याप्ति से होता है, सूर्य के चढ़ने या ढलने से नहीं. सूर्य ज्योतिष में आत्मा का कारक है और अस्तकाल में भी वही रहता है.
अर्घ्य का सही समय कहाँ से देखें?
अपने शहर के सूर्यास्त और सूर्योदय से. दोनों अर्घ्य इन्हीं दो क्षणों से बँधे हैं, और ये हर शहर में अलग होते हैं. पटना और दिल्ली के बीच लगभग आधे घंटे का अंतर रहता है, इसलिए किसी दूसरे शहर के लिए छपा समय सीधे मत उठाइए.
क्या छठ करने से कुंडली का कोई दोष दूर होता है?
मैं ऐसा दावा नहीं करूँगा. गोचर और दशा खगोलीय गणना से चलते हैं और किसी व्रत से उनका समय नहीं बदलता. छठ अनुशासन और कृतज्ञता का व्रत है, और इसे किसी दोष के इलाज के रूप में बेचा जाना ही वह चीज़ है जिससे मैं इस साइट को दूर रखता हूँ.

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