हर साल अक्टूबर आते ही एक ही सवाल बार-बार आता है। किसी के कैलेंडर में दिवाली एक दिन दिखती है, किसी के पंचांग में दूसरे दिन, और दोनों तरफ के लोग पूरे भरोसे से कहते हैं कि उनका वाला सही है।
इस झगड़े की जड़ खगोल में नहीं है। जड़ इस बात में है कि महीना कहाँ से गिना जा रहा है और तिथि किस समय पर देखी जा रही है।
नीचे मैंने 2027 की तारीखें दी हैं, और उसके बाद वह पूरा नियम जिससे ये तारीखें निकलती हैं। नियम समझ में आ गया तो अगले साल आपको किसी कैलेंडर की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दिवाली 2027 की पाँचों तारीखें
- धनतेरस: 27 अक्टूबर 2027
- नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली): 28 अक्टूबर 2027
- दिवाली और लक्ष्मी पूजन: 29 अक्टूबर 2027
- गोवर्धन पूजा: 30 अक्टूबर 2027
- भाई दूज: 31 अक्टूबर 2027
ये तारीखें इसी साइट के फेस्टिवल इंजन से निकाली गई हैं और तिथि के हिसाब से अलग से जाँची गई हैं। मैं यहाँ कोई ऐसी तारीख नहीं लिखता जो मैंने खुद न गिनी हो, क्योंकि इस साइट का पूरा दावा ही यही है कि गणित असली है।
दिवाली असल में किस चीज़ पर टिकी है
दिवाली का लंगर एक ही चीज़ है: अमावस्या तिथि। अमावस्या वह अवस्था है जब चंद्रमा सूर्य से 348 से 360 अंश आगे होता है, यानी दोनों एक ही राशि में, लगभग एक ही अंश पर आ जाते हैं। यह एक खगोलीय घटना है और पूरी पृथ्वी पर एक ही क्षण घटती है।
यहीं से गड़बड़ शुरू होती है। तिथि दिन नहीं होती। तिथि एक अवस्था होती है जो घड़ी के किसी भी समय शुरू और खत्म हो सकती है, क्योंकि चंद्रमा एक जैसी रफ्तार से नहीं चलता।
एक अमावस्या 22 घंटे की हो सकती है, दूसरी 26 घंटे की। इसलिए अमावस्या अक्सर दो अंग्रेजी तारीखों में फैल जाती है, और तब यह तय करना पड़ता है कि पर्व किस दिन माना जाए।
प्रदोष काल का नियम, जिस पर लक्ष्मी पूजन टिकता है
दिवाली के लिए निर्णय का पैमाना सूर्योदय नहीं है। लक्ष्मी पूजन प्रदोष काल का पर्व है, यानी सूर्यास्त के बाद का वह समय जब दीप जलाए जाते हैं। इसलिए नियम यह बनता है: जिस दिन प्रदोष काल में अमावस्या चल रही हो, दिवाली उसी दिन मानी जाती है।
यही वजह है कि दिवाली की तारीख कभी-कभी उस दिन नहीं पड़ती जिस दिन अमावस्या सूर्योदय के समय होती है। अगर अमावस्या दोपहर में शुरू होकर अगले दिन दोपहर तक चलती है, तो सूर्योदय के हिसाब से अगला दिन अमावस्या का दिन लगता है, लेकिन प्रदोष काल पहले दिन ही मिलता है। पर्व पहले दिन जाएगा।
घड़ी का सही समय आपके शहर के सूर्यास्त पर निर्भर करता है, और सूर्यास्त दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में अलग-अलग होता है। इसलिए मैं यहाँ कोई एक मुहूर्त समय नहीं लिख रहा। अपने शहर के सूर्यास्त से लगभग 24 मिनट बाद प्रदोष काल शुरू होता है, यह सामान्य नियम है, पर असली समय आपके अक्षांश पर निकलता है।
अमांत और पूर्णिमांत: एक ही दिन, दो महीनों के नाम
अब वह बात जो ज़्यादातर विवाद की असली वजह है और जो शायद ही कहीं साफ लिखी मिलती है।
भारत में महीना गिनने के दो तरीके चलते हैं। अमांत पद्धति में महीना अमावस्या पर खत्म होता है। पूर्णिमांत पद्धति में महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है। दोनों में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष वही रहते हैं, पर कृष्ण पक्ष किस महीने का कहलाएगा, यह बदल जाता है।
नतीजा यह होता है कि दिवाली की अमावस्या को अमांत पंचांग आश्विन अमावस्या कहता है और पूर्णिमांत पंचांग उसी दिन को कार्तिक अमावस्या कहता है। दिन एक ही है। तारीख एक ही है।
सिर्फ महीने का नाम अलग है। जब आप देखें कि एक सूची कहती है कार्तिक और दूसरी कहती है आश्विन, तो दोनों सही हैं और दोनों एक ही दिन की बात कर रही हैं।
इसी वजह से हर कृष्ण पक्ष का पर्व दो नामों से मिलता है। जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि, करवा चौथ, सब पर यह लागू होता है। महाशिवरात्रि 2027 वाली पोस्ट में मैंने यही उलझन फाल्गुन और माघ के संदर्भ में खोली है।
पाँच दिन का पर्व दो महीनों में फैलता है
यह बात लगभग कभी नहीं कही जाती और यह अमांत पद्धति का सीधा नतीजा है।
अमांत गिनती में धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दिवाली, तीनों कृष्ण पक्ष में हैं, यानी आश्विन मास के आखिरी तीन दिन। अमावस्या के साथ आश्विन खत्म हो जाता है। अगले दिन गोवर्धन पूजा शुक्ल प्रतिपदा है, यानी कार्तिक मास का पहला दिन, और भाई दूज कार्तिक शुक्ल द्वितीया है।
तो अमांत पंचांग के हिसाब से दिवाली का पाँच दिन का पर्व दो अलग महीनों में बँटा हुआ है, और महीना ठीक बीच में बदलता है। पूर्णिमांत पंचांग में पाँचों दिन कार्तिक में आते हैं। एक ही पर्व, दो वैध गिनतियाँ। यह विरोधाभास नहीं है, यह दो पद्धतियाँ हैं।
नरक चतुर्दशी और दिवाली कभी एक ही दिन क्यों आ जाती हैं
कुछ सालों में चतुर्दशी और अमावस्या एक ही अंग्रेजी तारीख पर आ जाती हैं और छोटी दिवाली अलग से नहीं मिलती। इसकी वजह फिर वही तिथि की लंबाई है।
अगर चतुर्दशी छोटी पड़ जाए और सूर्योदय से पहले ही खत्म हो जाए, तो उसे अपना पूरा दिन नहीं मिलता और वह अमावस्या वाले दिन में समा जाती है। इसका उल्टा भी होता है, जब कोई तिथि दो सूर्योदय छू ले और दो दिन तक चलती दिखे।
2027 में ऐसा नहीं हो रहा। पाँचों दिन अलग-अलग तारीखों पर मिल रहे हैं, 27 से 31 अक्टूबर तक लगातार।
आम गलतफहमी: मुहूर्त को घड़ी का जादू समझना
सबसे ज़्यादा फैली हुई गलतफहमी यह है कि लक्ष्मी पूजन का “शुभ मुहूर्त” एक ऐसी खिड़की है जिसमें पूजा कर लो तो नतीजा मिलता है और चूक गए तो सब बेकार।
शास्त्रीय अर्थ में मुहूर्त इतना ही कहता है कि उस अवधि में तिथि, वार और नक्षत्र का संयोग उस काम के अनुकूल है। यह एक गणना है, कोई गारंटी नहीं।
कोई भी शास्त्र यह नहीं कहता कि समय से चूकने पर हानि होगी, और जो लोग यह डर बेचते हैं वे शास्त्र नहीं बेच रहे। मैं यह साइट इसलिए बनाता हूँ कि गणित सामने रहे और डर पीछे छूटे।
दूसरी गलतफहमी यह है कि अमावस्या को अशुभ मानकर घबराया जाए। अमावस्या साल में बारह बार आती है और यह सिर्फ सूर्य-चंद्र की एक स्थिति है। कार्तिक की अमावस्या को दीप जलाने की परंपरा इसलिए है कि वह वर्ष की सबसे अंधेरी रातों में से एक होती है, और दीप का अर्थ ही अंधेरे के सापेक्ष है।
दिवाली के दिन आकाश में क्या हो रहा होता है
अमावस्या की परिभाषा से ही सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में, लगभग एक ही अंश पर होते हैं। कार्तिक की अमावस्या पर यह संयोग प्रायः तुला या वृश्चिक में बनता है, यह उस वर्ष की सटीक गणना पर निर्भर करता है।
लक्ष्मी का संबंध शास्त्रीय रूप से शुक्र से जोड़ा जाता है, और इसीलिए बहुत से लोग दिवाली के आसपास अपनी कुंडली में शुक्र की स्थिति देखना चाहते हैं।
अगर आपकी शुक्र की दशा चल रही है तो शुक्र महादशा वाली पोस्ट में मैंने उसका पूरा 20 साल का ढाँचा खोला है। यह पर्व की तारीख से जुड़ा नहीं है, यह अलग गणना है, पर सवाल अक्सर साथ ही आता है।
साल के दूसरे बड़े पर्वों की तिथि-गणना देखनी हो तो मकर संक्रांति 2027 सौर गणना का उदाहरण है और होली 2027 पूर्णिमा आधारित गणना का। तीनों को साथ पढ़ने पर पंचांग की पूरी तस्वीर बन जाती है।
दिवाली 2027 कब है?
दिवाली और लक्ष्मी पूजन 29 अक्टूबर 2027 को है। धनतेरस 27 अक्टूबर, नरक चतुर्दशी 28 अक्टूबर, गोवर्धन पूजा 30 अक्टूबर और भाई दूज 31 अक्टूबर 2027 को पड़ रहे हैं।
कुछ पंचांग इसे कार्तिक अमावस्या और कुछ आश्विन अमावस्या क्यों कहते हैं?
क्योंकि महीना गिनने की दो पद्धतियाँ हैं। अमांत पद्धति में महीना अमावस्या पर खत्म होता है, इसलिए यह दिन आश्विन का आखिरी दिन कहलाता है। पूर्णिमांत पद्धति में महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है, इसलिए वही दिन कार्तिक में गिना जाता है। तारीख एक ही है, सिर्फ महीने का नाम अलग है।
लक्ष्मी पूजन का समय किस नियम से तय होता है?
लक्ष्मी पूजन प्रदोष काल का पर्व है, यानी सूर्यास्त के बाद का समय। नियम यह है कि जिस दिन प्रदोष काल में अमावस्या तिथि चल रही हो, दिवाली उसी दिन मानी जाती है। सटीक समय आपके शहर के सूर्यास्त पर निर्भर करता है, इसलिए एक ही समय पूरे देश के लिए नहीं लिखा जा सकता।
क्या मुहूर्त चूक जाने से पूजा का फल नहीं मिलता?
शास्त्रीय गणना इतना ही कहती है कि उस अवधि में तिथि, वार और नक्षत्र का संयोग उस काम के अनुकूल है। यह एक गणना है, कोई गारंटी या शर्त नहीं। समय चूकने पर हानि होने की बात शास्त्र में नहीं मिलती।
दिवाली की तारीख हर साल क्यों बदलती है?
क्योंकि यह चंद्र तिथि पर आधारित है और चंद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटा होता है। इसी अंतर को अधिक मास जोड़कर संतुलित किया जाता है, जिससे तारीख हर साल अलग अंग्रेजी दिन पर पड़ती है।
क्या नरक चतुर्दशी और दिवाली एक ही दिन हो सकती हैं?
हाँ। अगर चतुर्दशी तिथि छोटी पड़कर सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाए तो उसे अपना अलग दिन नहीं मिलता और वह अमावस्या वाले दिन में समा जाती है। 2027 में ऐसा नहीं हो रहा, पाँचों दिन अलग-अलग तारीखों पर मिल रहे हैं।

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