हर साल जन्माष्टमी से एक हफ्ते पहले वही खींचतान शुरू हो जाती है। एक कैलेंडर एक तारीख दिखाता है, मंदिर की सूचना दूसरी तारीख लगाता है, और घर में कोई बुजुर्ग कहते हैं कि असली जन्माष्टमी तो अगले दिन है। फिर बहस इस बात पर पहुँच जाती है कि रोहिणी नक्षत्र इस बार पड़ रहा है या नहीं।
यह उलझन बेवजह नहीं है। जन्माष्टमी उन गिने-चुने व्रतों में से है जहाँ शास्त्र ने खुद एक से ज़्यादा नियम दिए हैं, और अलग-अलग परंपराएँ अलग नियम को पहला दर्जा देती हैं। तो इस बार तारीख भी बताता हूँ और यह भी कि यह दो हिस्सों में क्यों बँटती है।
जन्माष्टमी 2027 की तारीख
साल 2027 में कृष्ण जन्माष्टमी बुधवार, 25 अगस्त को है। तिथि श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी है।
यह तारीख इस साइट के अपने गणना इंजन से निकली है और तिथि से अलग से मिलाकर देखी गई है। मैं इसे किसी सूची से उठाकर नहीं लिख रहा, क्योंकि त्योहार की गलत तारीख इस पूरे काम का सबसे भारी नुकसान है।
यहाँ एक बात साफ कर देता हूँ। वैष्णव परंपरा, खासकर इस्कॉन और कुछ मंदिर, कई सालों में स्मार्त परंपरा से एक दिन आगे की तारीख मानते हैं, क्योंकि वैष्णव निर्णय एक शर्त और जोड़ता है, कि अष्टमी सप्तमी से विद्ध यानी मिली हुई न हो। 2027 में अष्टमी तिथि 24 अगस्त शाम लगभग 8:24 बजे शुरू होकर 25 अगस्त शाम लगभग 7:19 बजे तक चलती है, इसलिए 25 अगस्त के सूर्योदय पर अष्टमी पहले से चल रही है और सप्तमी से मिली हुई नहीं है।
यही शर्त वैष्णव निर्णय को भी संतुष्ट करती है, इसलिए इस साल स्मार्त और वैष्णव दोनों परंपराएँ 25 अगस्त पर ही आकर मिलती हैं, अलग तारीखें नहीं बनतीं। ऐसा हर साल नहीं होता, पर 2027 उन्हीं सालों में है जहाँ यह बहस सिरे से खड़ी ही नहीं होती।
श्रावण या भाद्रपद, यह झगड़ा असल में झगड़ा है ही नहीं
उत्तर भारत के पंचांग अक्सर लिखते हैं कि जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को है। दक्षिण और पश्चिम के पंचांग उसी दिन को श्रावण कृष्ण अष्टमी कहते हैं। लोग इसे दो अलग तिथियाँ समझ लेते हैं और तारीख पर शक करने लगते हैं।
दिन एक ही है। फर्क सिर्फ महीने की गिनती के तरीके का है। पूर्णिमांत पद्धति में महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है, इसलिए पूर्णिमा के बाद वाला कृष्ण पक्ष अगले महीने के नाम से चलता है। अमांत पद्धति में महीना अमावस्या पर खत्म होता है, इसलिए वही कृष्ण पक्ष पिछले महीने के नाम में रह जाता है।
इसका मतलब यह है कि हर कृष्ण पक्ष के त्योहार का महीना दो नामों से पुकारा जाएगा और दोनों सही होंगे। तिथि, पक्ष और असली दिन तीनों एक ही रहते हैं। यही बात मकर संक्रांति जैसे सौर त्योहारों पर लागू नहीं होती, क्योंकि वे चंद्र महीने से बंधे ही नहीं हैं।
असली नियम: निशीथ काल की अष्टमी
अब वह हिस्सा जो ज़्यादातर जगह छूट जाता है। जन्माष्टमी का निर्णय सूर्योदय की तिथि से नहीं होता।
ज़्यादातर व्रत उस तिथि पर तय होते हैं जो सूर्योदय के समय चल रही हो। जन्माष्टमी अलग है क्योंकि कृष्ण का जन्म आधी रात को माना गया है। इसलिए निर्णय का बिंदु निशीथ काल है, यानी रात का वह मध्य भाग जो सूर्यास्त से सूर्योदय तक की रात को बराबर बाँटकर बीच में निकलता है।
जिस रात निशीथ काल में अष्टमी तिथि चल रही हो, वही जन्माष्टमी की रात मानी जाती है। इसीलिए ऐसा हो सकता है कि सूर्योदय पर सप्तमी हो और फिर भी उसी दिन की रात जन्माष्टमी की रात बने, क्योंकि अष्टमी दोपहर या शाम को लगकर आधी रात तक चल रही है।
तिथि सूर्योदय से सूर्योदय तक टिकी नहीं रहती। वह सूरज और चाँद के बीच के बारह अंश के फासले से बनती है और उसकी लंबाई उन्नीस से छब्बीस घंटे के बीच घटती-बढ़ती रहती है। यही वजह है कि तिथि किसी भी घड़ी के समय पर शुरू और खत्म हो सकती है।
रोहिणी नक्षत्र का असली दर्जा
यहाँ सबसे आम गलतफहमी है। बहुत लोग मानते हैं कि जन्माष्टमी तभी असली है जब रोहिणी नक्षत्र भी साथ हो, और अगर रोहिणी न मिले तो व्रत अधूरा है।
शास्त्र यह नहीं कहता। व्रत का आधार अष्टमी तिथि है। रोहिणी नक्षत्र का मिलना एक अतिरिक्त और दुर्लभ संयोग है, अनिवार्य शर्त नहीं।
जब निशीथ काल में अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र दोनों एक साथ मिलते हैं, तब उस योग को अलग नाम दिया जाता है, कृष्ण जयंती, और उसे विशेष माना जाता है। जब यह मेल नहीं बनता, व्रत तब भी पूरा और मान्य रहता है।
तर्क भी सीधा है। कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ, यह परंपरा कहती है। तिथि और नक्षत्र दो अलग चक्र हैं जो अलग-अलग गति से घूमते हैं, इसलिए दोनों का हर साल एक ही रात पर मिलना गणित से ही संभव नहीं है। अगर रोहिणी अनिवार्य शर्त होती तो जन्माष्टमी कई साल पड़ती ही नहीं।
रोहिणी चंद्रमा की अपनी उच्च राशि वृषभ में पड़ने वाला नक्षत्र है और उसका स्वामी स्वयं चंद्रमा है, इसलिए चंद्र महादशा पढ़ते समय भी यह नक्षत्र अलग से ध्यान माँगता है।
स्मार्त और वैष्णव निर्णय अलग क्यों होते हैं
दोनों परंपराएँ एक ही तिथि देखती हैं, पर अलग शर्तें लगाती हैं।
स्मार्त निर्णय मुख्य रूप से निशीथ काल में अष्टमी की उपस्थिति पर टिका है। रोहिणी का मेल हो तो और अच्छा, न हो तो भी निर्णय बदलता नहीं।
वैष्णव निर्णय में एक अतिरिक्त शर्त जुड़ती है, कि अष्टमी सप्तमी से विद्ध यानी मिली हुई न हो। अगर अष्टमी के शुरू होने से पहले वाला हिस्सा सप्तमी से छू रहा है, तो वैष्णव पद्धति अगले दिन को चुनती है, जब अष्टमी शुद्ध रूप से या नवमी के साथ मिलती है। पारण का समय भी इसी हिसाब से आगे खिसक जाता है।
यह मतभेद नहीं, दो अलग निर्णय-नियम हैं जो कुछ सालों में एक ही तारीख देते हैं और कुछ सालों में एक दिन का फर्क बना देते हैं। जिस परंपरा का आप पालन करते हैं, उसी का नियम आपके लिए सही है। किसी को गलत ठहराने की ज़रूरत नहीं।
वह बात जो कम कही जाती है
जन्माष्टमी अकेला बड़ा व्रत है जिसमें उपवास सूर्यास्त पर नहीं टूटता और आधी रात पर भी नहीं टूटता। पारण अगले दिन तब होता है जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र, दोनों में से जो भी बाद में खत्म हो, वह खत्म हो जाए।
यानी पारण का समय हर साल और हर शहर में अलग निकलता है, और वह पूजा के समय से पूरी तरह अलग गणना है। ज़्यादातर लेख पूजा का मुहूर्त तो देते हैं पर पारण की शर्त छोड़ देते हैं, जिससे लोग सुबह होते ही व्रत तोड़ देते हैं जबकि नियम कुछ घंटे और माँग रहा होता है।
दूसरी कम कही जाने वाली बात यह है कि निशीथ काल घड़ी की बारह बजे वाली रात नहीं है। वह सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच की असली रात का मध्य भाग है, इसलिए उसका समय शहर के अक्षांश और साल के दिन दोनों से बदलता है।
अगस्त के अंत में दिल्ली और चेन्नई की रात की लंबाई अलग है, इसलिए निशीथ का समय भी अलग निकलेगा।
इस साल के लिए व्यावहारिक बात
तारीख 25 अगस्त 2027, बुधवार। तिथि श्रावण कृष्ण अष्टमी, जिसे पूर्णिमांत पंचांग भाद्रपद कृष्ण अष्टमी लिखेंगे।
निशीथ काल का समय, पूजा का मुहूर्त और पारण का समय तीनों आपके शहर पर निर्भर हैं, इसलिए उन्हें अपने अक्षांश और देशांतर के साथ निकलवाइए। किसी राष्ट्रीय समय को अपने शहर पर लागू मत कीजिए, फर्क आधे घंटे से ऊपर भी जा सकता है। यही सावधानी गणेश चतुर्थी जैसे तिथि-आधारित त्योहारों पर भी लागू होती है।
और आखिर में एक बात जो मैं हर पन्ने पर लिखता हूँ। यह साइट गणना करती है और शास्त्र क्या कहता है वह बताती है।
यह किसी नतीजे की गारंटी नहीं देती, किसी उपाय की ज़रूरत नहीं बताती, और डर बेचने के काम में नहीं है। व्रत रखिए या न रखिए, यह आपका फैसला है और उसे सही ठहराने के लिए किसी भविष्यवाणी की ज़रूरत नहीं।
स्रोत
जन्माष्टमी का निर्णय, निशीथ काल की परिभाषा और सप्तमी-विद्धा अष्टमी का नियम निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु, दोनों ग्रंथों में जन्माष्टमी-निर्णय के प्रसंग में मिलते हैं। रोहिणी के साथ बनने वाले जयंती योग का उल्लेख भी वहीं है। यह किस अध्याय या प्रकरण संख्या में ठीक-ठीक मिलता है, यह मैं किसी पुष्ट स्रोत से सत्यापित नहीं कर पाया, इसलिए संख्या यहाँ नहीं लिख रहा।
जन्माष्टमी 2027 कब है?
25 अगस्त 2027, बुधवार। तिथि श्रावण कृष्ण अष्टमी है, जिसे पूर्णिमांत पंचांग भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के नाम से लिखते हैं। दोनों एक ही दिन हैं।
क्या रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी अधूरी रहती है?
नहीं। व्रत का आधार निशीथ काल में अष्टमी तिथि का होना है। रोहिणी का मिलना एक अतिरिक्त और दुर्लभ संयोग है जिसे कृष्ण जयंती कहते हैं। मेल न बने तब भी व्रत पूरा माना जाता है।
स्मार्त और वैष्णव जन्माष्टमी की तारीख अलग क्यों होती है?
स्मार्त निर्णय निशीथ काल में अष्टमी की उपस्थिति पर टिका है। वैष्णव निर्णय एक शर्त और जोड़ता है, कि अष्टमी सप्तमी से विद्ध न हो, इसलिए कुछ सालों में वह अगले दिन पर चला जाता है। 2027 में अष्टमी सूर्योदय से पहले ही शुरू हो चुकी होती है, इसलिए यह शर्त भी पूरी होती है और दोनों परंपराएँ 25 अगस्त पर मिलती हैं।
निशीथ काल का मतलब क्या है?
सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक की रात को बराबर हिस्सों में बाँटने पर जो मध्य भाग आता है, वह निशीथ काल है। यह घड़ी के बारह बजे से अलग है और शहर के अक्षांश तथा साल के दिन के हिसाब से बदलता रहता है।
जन्माष्टमी का व्रत कब तोड़ा जाता है?
पारण अगले दिन तब किया जाता है जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से जो भी बाद में समाप्त हो, वह समाप्त हो जाए। यह समय हर साल और हर शहर के लिए अलग निकलता है, इसलिए अपने स्थान के लिए गणना करवाइए।
क्या श्रावण और भाद्रपद वाली दो अलग जन्माष्टमी होती हैं?
नहीं। दिन एक ही है। अमांत पद्धति उसे श्रावण कृष्ण अष्टमी कहती है और पूर्णिमांत पद्धति भाद्रपद कृष्ण अष्टमी। फर्क सिर्फ महीने की गिनती के तरीके का है, तिथि और दिन वही रहते हैं।

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