कुंडली की रिपोर्ट में एक पंक्ति सबसे ज़्यादा पढ़ी जाती है। “आपका शुक्र उच्च का है।” या इससे उल्टी वाली, “आपका मंगल नीच का है।” दोनों वाक्य ऐसे बोले जाते हैं जैसे उनसे बात खत्म हो जाती हो।
असल में यह वाक्य अधूरा है, और अधूरा इसलिए है कि उसमें एक संख्या गायब है। उच्च और नीच पूरी राशि का गुण नहीं हैं।
हर ग्रह के लिए एक सटीक अंश तय है जहाँ वह परम उच्च होता है, और उससे दूर हटते ही बल कम होता जाता है। यह बात शास्त्र में साफ़ लिखी है और आम चर्चा से लगभग पूरी तरह गायब है।
इस पोस्ट में तीनों चीज़ें हैं। सातों ग्रहों की सही डिग्री, वह गणित जिससे बल घटता है, और वह गलती जो इस विषय पर सबसे ज़्यादा होती है।
उच्च और नीच का असली अर्थ
उच्च का अर्थ है वह राशि जिसमें कोई ग्रह अपने स्वभाव को सबसे साफ़ और सबसे बिना रुकावट के व्यक्त कर पाता है। नीच का अर्थ है उसकी ठीक विपरीत स्थिति, जहाँ वही स्वभाव सबसे ज़्यादा दबाव में काम करता है।
ध्यान देने की बात यह है कि यह ग्रह की अपनी दशा का माप है। यह इस बात का माप नहीं है कि वह ग्रह आपके लिए क्या करेगा।
वह दूसरा सवाल है और उसका जवाब इस बात से आता है कि ग्रह किन भावों का स्वामी है और किस भाव में बैठा है। यही वह जगह है जहाँ ज़्यादातर पाठ फिसल जाते हैं, और इस पर पोस्ट के अंत में अलग से लिखा है।
सातों ग्रहों की परम उच्च डिग्री
शास्त्रीय सूची इस तरह है। हर पंक्ति में राशि और उसके भीतर का वह सटीक अंश है जिसे परम उच्च कहा जाता है।
- सूर्य: मेष, 10 अंश
- चंद्र: वृषभ, 3 अंश
- मंगल: मकर, 28 अंश
- बुध: कन्या, 15 अंश
- गुरु: कर्क, 5 अंश
- शुक्र: मीन, 27 अंश
- शनि: तुला, 20 अंश
ये अंश बीपीएचएस के ग्रह गुण स्वरूप वाले अध्याय, अध्याय 3 में दिए गए हैं।
एक बात यहीं दर्ज कर लीजिए। बुध की उच्च राशि कन्या है और कन्या उसकी अपनी राशि भी है। पूरे चक्र में यह अकेला ग्रह है जिसके साथ ऐसा होता है। इसी वजह से बुध के लिए स्वराशि और उच्च राशि का फ़र्क करना पड़ता है, और मूल त्रिकोण की अलग पट्टी इसी उलझन को सुलझाती है।
नीच बिंदु ठीक सामने है
नीच निकालने के लिए कोई अलग सूची याद करने की ज़रूरत नहीं है। नीच बिंदु उच्च बिंदु से ठीक एक सौ अस्सी अंश दूर होता है, यानी सातवीं राशि में उसी अंश पर।
- सूर्य: तुला, 10 अंश
- चंद्र: वृश्चिक, 3 अंश
- मंगल: कर्क, 28 अंश
- बुध: मीन, 15 अंश
- गुरु: मकर, 5 अंश
- शुक्र: कन्या, 27 अंश
- शनि: मेष, 20 अंश
यह समरूपता ही आगे की पूरी गणना का आधार है। एक ही धुरी है जिसका एक सिरा उच्च है और दूसरा नीच, और हर ग्रह उस धुरी पर कहीं न कहीं खड़ा है।
बल डिग्री के साथ घटता बढ़ता है
अब वह हिस्सा जो शायद ही कहीं बताया जाता है। षड्बल की गणना में एक अंग उच्च बल कहलाता है, और वह पूरी तरह इसी दूरी से निकलता है।
तरीका यह है। ग्रह के देशांतर और उसके नीच बिंदु के देशांतर का अंतर लीजिए। अगर अंतर एक सौ अस्सी अंश से ज़्यादा निकले तो उसे तीन सौ साठ में से घटा दीजिए। जो बचे उसे तीन से भाग दीजिए। जो संख्या मिलेगी वह विरूप में उच्च बल है, और उसकी सीमा शून्य से साठ तक है।
इस एक सूत्र से तीन बातें साफ़ हो जाती हैं।
- ठीक परम उच्च बिंदु पर बल पूरे साठ विरूप होता है।
- ठीक नीच बिंदु पर बल शून्य होता है।
- बीच में बल एक सीधी रेखा में बदलता है, इसलिए उच्च राशि में होते हुए भी परम बिंदु से दूर बैठा ग्रह उतना बलवान नहीं होता।
एक उदाहरण लीजिए। शनि तुला में 20 अंश पर परम उच्च है। तुला में 20 अंश पर बैठा शनि पूरे साठ विरूप लाता है। वही शनि तुला में 29 अंश पर बैठा हो तो वह अब भी उच्च राशि में है और उसका उच्च बल घटकर लगभग सत्तावन विरूप रह जाता है।
और मीन में 20 अंश पर बैठा शनि, जो न उच्च है न नीच, लगभग तीस विरूप पर खड़ा होता है, यानी ठीक बीच में।
यही कारण है कि किसी को “मेरा शनि उच्च का है” कहते सुनकर अगला सवाल हमेशा एक ही होना चाहिए। कितने अंश पर। बिना अंश के वह वाक्य आधा है। शनि की भाव स्थिति कैसे पढ़ी जाती है, यह देखने के लिए शनि द्वितीय भाव में वाली पोस्ट काम आती है।
मूल त्रिकोण: एक तीसरा दर्जा
उच्च और स्वराशि के बीच में एक तीसरा दर्जा है, मूल त्रिकोण। यह एक राशि के भीतर की एक अंश पट्टी है, न कि पूरी राशि।
- सूर्य: सिंह, 0 से 20 अंश
- चंद्र: वृषभ, 4 से 30 अंश
- मंगल: मेष, 0 से 12 अंश
- बुध: कन्या, 16 से 20 अंश
- गुरु: धनु, 0 से 10 अंश
- शुक्र: तुला, 0 से 15 अंश
- शनि: कुंभ, 0 से 20 अंश
चंद्रमा की पंक्ति सबसे ज़्यादा बताने वाली है। उसका परम उच्च वृषभ में 3 अंश पर है और उसका मूल त्रिकोण वृषभ में 4 अंश से शुरू होता है। दोनों पट्टियाँ एक दूसरे से सटी हुई हैं और आपस में टकराती नहीं। यह संयोग नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि ये दर्जे एक ही राशि के भीतर क्रम से बाँटे गए थे।
बुध की पंक्ति दूसरी दिलचस्प है। कन्या 0 से 15 अंश तक उच्च का प्रभाव देती है, 16 से 20 अंश मूल त्रिकोण है और बाकी स्वराशि। एक ही राशि, तीन दर्जे।
राहु और केतु का सवाल
राहु और केतु के लिए उच्च और नीच राशियों पर ग्रंथों में एकमत नहीं है। कुछ परंपराएँ राहु का उच्च वृषभ मानती हैं और कुछ मिथुन। केतु के लिए वृश्चिक और धनु दोनों नाम मिलते हैं।
बीपीएचएस छाया ग्रहों के लिए उच्च नीच की वह स्पष्ट सूची नहीं देता जो सात ग्रहों के लिए देता है। इसलिए मैं यहाँ कोई एक पक्ष चुनकर उसे शास्त्र की तरह नहीं लिखूँगा। जहाँ स्रोत एकमत नहीं है, वहाँ यही लिख देना ईमानदार तरीका है।
सबसे आम गलत व्याख्या
सबसे बड़ी गलती यह है कि उच्च को अच्छे फल की गारंटी और नीच को बुरे फल की गारंटी मान लिया जाता है।
उच्च नीच स्थान बल का माप है, यानी ग्रह अपनी प्रकृति को कितनी स्पष्टता से व्यक्त कर पा रहा है। वह ग्रह आपके जीवन में क्या करेगा, यह उसकी स्वामित्व स्थिति से तय होता है।
एक ऐसा ग्रह जो आपके छठे और ग्यारहवें भाव का स्वामी हो और उच्च का हो, वह अपने काम को पूरी ताकत से करेगा, और उसका काम वही रहेगा जो उसके भावों ने तय किया है। बल स्वभाव को बदलता नहीं। वह उसे और स्पष्ट कर देता है।
दूसरी आम गलती यह है कि लोग राशि देखकर रुक जाते हैं और अंश देखते ही नहीं। ऊपर वाला उदाहरण दोहराने लायक है।
तुला में 29 अंश का शनि और तुला में 20 अंश का शनि, दोनों को रिपोर्ट में “उच्च” लिखा जाएगा और दोनों का उच्च बल एक जैसा नहीं है। यही सावधानी वर्गोत्तम पर भी लागू होती है, जहाँ पूरी स्थिति एक 3 अंश 20 कला की पट्टी पर टिकी है।
नीच भंग का सही स्थान
नीच की चर्चा अधूरी रहती है अगर उसके साथ भंग के नियम न आएँ। शास्त्र नीच स्थिति को घोषित करके छोड़ता नहीं। वह उसी के साथ वे शर्तें देता है जिनसे परिणाम बदल जाता है, जैसे नीच राशि का स्वामी केंद्र में हो, या जिस ग्रह की वह उच्च राशि है वह केंद्र में हो।
यह पूरा ढाँचा नीच भंग राज योग वाली पोस्ट में खुला है और उसे इस पोस्ट के साथ पढ़ना चाहिए, क्योंकि अकेले नीच की जानकारी आधा चित्र देती है। सूर्य जैसे ग्रह की भाव स्थिति इस पूरे हिसाब को कैसे मोड़ती है, यह सूर्य सप्तम भाव में वाली पोस्ट में देखा जा सकता है।
आखिर में वही बात जो इस साइट पर हर जगह लागू है। ये सब गणनाएँ हैं और गणना बताती है कि आकाश में क्या था। इससे आगे किसी घटना की गारंटी कोई नहीं दे सकता, और जो दे रहा है वह गणना से आगे की बात कर रहा है।
उच्च राशि और परम उच्च अंश में क्या फ़र्क है?
उच्च राशि पूरी तीस अंश की राशि है जिसमें ग्रह उच्च कहलाता है। परम उच्च अंश उस राशि के भीतर का वह एक सटीक बिंदु है जहाँ उच्च बल पूरे साठ विरूप होता है। उस बिंदु से दूर हटते ही बल घटने लगता है।
सातों ग्रहों की परम उच्च डिग्री क्या है?
सूर्य मेष 10 अंश, चंद्र वृषभ 3 अंश, मंगल मकर 28 अंश, बुध कन्या 15 अंश, गुरु कर्क 5 अंश, शुक्र मीन 27 अंश और शनि तुला 20 अंश।
नीच बिंदु कैसे निकालते हैं?
नीच बिंदु उच्च बिंदु से ठीक एक सौ अस्सी अंश दूर होता है, यानी सातवीं राशि में उसी अंश पर। अलग सूची याद करने की ज़रूरत नहीं होती।
उच्च बल की गणना कैसे होती है?
ग्रह के देशांतर और उसके नीच बिंदु के बीच का अंतर लीजिए, अंतर एक सौ अस्सी से ज़्यादा हो तो उसे तीन सौ साठ में से घटाइए, और नतीजे को तीन से भाग दीजिए। यह विरूप में उच्च बल है, जिसकी सीमा शून्य से साठ तक है।
क्या उच्च ग्रह हमेशा शुभ फल देता है?
नहीं। उच्च नीच स्थान बल का माप है, यानी ग्रह अपने स्वभाव को कितनी स्पष्टता से व्यक्त कर पा रहा है। वह आपके लिए क्या करेगा यह उसके भाव स्वामित्व और स्थिति से तय होता है। बल स्वभाव को बदलता नहीं। वह उसे और स्पष्ट कर देता है।
राहु और केतु की उच्च राशि कौन सी है?
इस पर ग्रंथों में एकमत नहीं है। राहु के लिए वृषभ और मिथुन दोनों नाम मिलते हैं, केतु के लिए वृश्चिक और धनु। छाया ग्रहों के लिए वह स्पष्ट सूची नहीं मिलती जो सात ग्रहों के लिए मिलती है, इसलिए यहाँ कोई एक पक्ष शास्त्र की तरह नहीं लिखा गया।

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