कुंडली में नक्षत्र के आगे एक अंक लिखा दिखता है। अश्विनी 3, रोहिणी 1, मघा 4। ज़्यादातर लोग इसे नाम का अक्षर तय करने वाली चीज़ मानकर आगे बढ़ जाते हैं। वह काम भी पद करता है, पर वह उसका सबसे छोटा काम है।
असल में पद वह जगह है जहाँ नक्षत्र की गिनती और वर्ग-कुंडली की गिनती आकर मिलती हैं। एक पद ठीक एक नवांश के बराबर होता है।
यानी जिस अंक को लोग नाम का अक्षर समझकर छोड़ देते हैं, वही अंक नवांश कुंडली में उस ग्रह की राशि तय करता है। यह एक ही तथ्य है और इसे समझ लेने के बाद पूरी व्यवस्था खुल जाती है।
पद है क्या, अंकगणित से
पूरा राशिचक्र 360 अंश का है। उसे 27 नक्षत्रों में बराबर बाँटा गया है, तो हर नक्षत्र 13 अंश 20 कला चौड़ा हुआ। 360 को 27 से भाग दीजिए, यही मिलेगा।
अब हर नक्षत्र को चार बराबर हिस्सों में बाँटिए। 13 अंश 20 कला को चार से भाग देने पर 3 अंश 20 कला आता है। यही एक पद है। हिस्सा, चरण, पाद, तीनों नाम एक ही चीज़ के हैं।
कुल गिनती सीधी है। 27 गुणा 4 बराबर 108 पद। यह वही 108 है जो माला में है, और यह संयोग नहीं लगता, हालाँकि इसका शास्त्रीय आधार मैंने किसी एक ग्रंथ में साफ़ लिखा नहीं देखा।
हर राशि में ठीक नौ पद
यहाँ एक और गणना है जो पूरी व्यवस्था को जोड़ती है। हर राशि 30 अंश की है। एक पद 3 अंश 20 कला का है। 30 को 3 अंश 20 कला से भाग दीजिए और ठीक नौ आता है।
तो हर राशि में ठीक नौ पद समाते हैं। बारह राशियाँ गुणा नौ पद बराबर 108, वही संख्या जो 27 गुणा 4 से आई थी। दोनों रास्ते एक ही जगह पहुँचते हैं, और यही वजह है कि नक्षत्र-व्यवस्था और राशि-व्यवस्था एक-दूसरे में ठीक बैठ जाती हैं।
पर नक्षत्र की सीमा और राशि की सीमा हमेशा एक जगह नहीं पड़तीं। एक नक्षत्र 13 अंश 20 कला का है और एक राशि 30 अंश की, और 30 में 13 अंश 20 कला सवा दो बार आता है।
इसका सीधा नतीजा यह है कि 27 में से नौ नक्षत्र किसी राशि की सीमा पर बँटे हुए हैं। कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा और पूर्वाभाद्रपद। इनका कुछ हिस्सा एक राशि में है और बाक़ी अगली में।
कृत्तिका इसका सबसे साफ़ उदाहरण है। उसका पहला पद मेष में पड़ता है और बाक़ी तीन वृषभ में। इसलिए दो लोग दोनों कृत्तिका नक्षत्र के हो सकते हैं और उनकी जन्म राशि अलग हो सकती है। जहाँ भी गणना जन्म राशि पर टिकती है, वहाँ यह फ़र्क़ सीधे असर डालता है।
पद और नवांश एक ही चीज़ हैं
अब वह बात जो इस पूरे विषय की जड़ है।
नवांश हर राशि को नौ बराबर हिस्सों में बाँटता है। 30 अंश बटा नौ बराबर 3 अंश 20 कला। यह ठीक वही माप है जो एक पद का है।
तो एक पद और एक नवांश एक ही चौड़ाई के दो नाम हैं। नक्षत्र की तरफ़ से गिनिए तो उसे पद कहते हैं, राशि की तरफ़ से गिनिए तो नवांश। कोई ग्रह जिस पद में है, वह ठीक उसी नवांश में है, और उस नवांश की जो राशि है वही D9 कुंडली में उस ग्रह की राशि होगी।
इसीलिए पद का अंक इतना काम का है। वह नाम का अक्षर देता है, यह ठीक है, पर उससे कहीं ज़्यादा वह नवांश कुंडली का पूरा नक़्शा तय करता है। वर्ग-कुंडलियों की पूरी व्यवस्था और उनका आपसी भार षोडशवर्ग में देखा जा सकता है, जहाँ नवांश को हर योजना में जगह मिलती है।
108 नवांश का एक अटूट चक्र
नवांश की राशि निकालने का नियम आम तौर पर तीन हिस्सों में सिखाया जाता है। चर राशि का पहला नवांश उसी राशि से शुरू होता है, स्थिर राशि का पहला नवांश उससे नौवीं राशि से, और द्विस्वभाव राशि का पहला नवांश उससे पाँचवीं राशि से।
यह नियम ठीक है, पर इसे याद रखना कठिन है। इसका आसान रूप यह है। मेष के पहले नवांश से शुरू कीजिए और बिना रुके गिनते चले जाइए। मेष के नौ नवांश मेष से धनु तक जाते हैं।
अगला नवांश मकर होगा, और वही वृषभ का पहला नवांश है। वृषभ के नौ नवांश मकर से कन्या तक जाते हैं, अगला तुला होगा, और वही मिथुन का पहला नवांश है।
यानी 108 नवांश पूरे राशिचक्र में एक अटूट लड़ी की तरह चलते हैं। कहीं कोई छलाँग नहीं, कहीं कोई नियम-बदल नहीं। चर, स्थिर और द्विस्वभाव वाला तीन-हिस्सों का नियम इसी लड़ी का नतीजा है, कोई अलग नियम नहीं। यह बात मुझे बहुत देर से समझ आई और इसके बाद नवांश निकालना बहुत आसान हो गया।
सबसे आम गलतफ़हमी
अब वह गलत व्याख्या जिसे सुधारना सबसे ज़रूरी है। लोग मान लेते हैं कि एक ही नक्षत्र के चारों पद एक जैसे होते हैं और उनमें बस हल्का सा अंतर होता है। यह गलत है और इसका असर पूरी रीडिंग पर पड़ता है।
अश्विनी को लीजिए। चारों पदों का नक्षत्र स्वामी केतु ही रहता है, यह सच है। पर पहला पद मेष नवांश में गिरता है जिसका स्वामी मंगल है, दूसरा वृषभ में जिसका स्वामी शुक्र है, तीसरा मिथुन में जिसका स्वामी बुध है, और चौथा कर्क में जिसका स्वामी चंद्रमा है।
यानी एक ही नक्षत्र के भीतर चार अलग नवांश स्वामी बैठे हैं। अश्विनी पहला पद और अश्विनी चौथा पद, दोनों की D9 राशि अलग है, दोनों का नवांश स्वामी अलग है, और D9 में उनकी भाव-स्थिति भी अलग निकलती है। नक्षत्र एक है और उसके भीतर की तस्वीर चार अलग तस्वीरें हैं।
यही वजह है कि पद-स्तर की रीडिंग नक्षत्र-स्तर की रीडिंग से काफ़ी अलग निकल सकती है। इसका असर आप चंद्रमा रोहिणी पद 1 और बुध आर्द्रा पद 2 जैसे पन्नों में सीधे देख सकते हैं, जहाँ पूरी रीडिंग उसी एक पद पर टिकी है।
वर्गोत्तम की पट्टी पद से तय होती है
एक ग्रह वर्गोत्तम तब कहलाता है जब वह D1 और D9 दोनों में एक ही राशि में हो। अब लड़ी वाले नियम को लगाइए और देखिए कि यह कब होगा।
चर राशियों में पहला नवांश उसी राशि का होता है, तो वर्गोत्तम की पट्टी राशि के शुरू में पड़ती है, यानी पहले पद में, 0 अंश से 3 अंश 20 कला तक।
स्थिर राशियों में पहला नवांश नौवीं राशि से शुरू होता है, इसलिए उसी राशि का नवांश पाँचवें नंबर पर आता है, यानी पट्टी बीच में पड़ती है, 13 अंश 20 कला से 16 अंश 40 कला तक।
द्विस्वभाव राशियों में उसी राशि का नवांश नौवें नंबर पर आता है, तो पट्टी आख़िर में पड़ती है, 26 अंश 40 कला से 30 अंश तक।
यह पूरी बात किसी अलग नियम से नहीं आई। वह उसी 108 की लड़ी का सीधा नतीजा है। वर्गोत्तम का अर्थ और उसकी सही व्याख्या वर्गोत्तम वाले पन्ने पर है, जहाँ यह भी लिखा है कि इसे बल का पर्याय मान लेना क्यों गलत है।
जन्म का अक्षर और 108 पद
अब वह काम जिसके लिए पद सबसे ज़्यादा जाना जाता है। परंपरा में हर पद के साथ एक नामाक्षर जुड़ा है, और बच्चे का नाम उसी अक्षर से शुरू करने की रीत रही है। 108 पद, 108 अक्षर।
इसमें ध्यान देने की एक बात है। नामाक्षर पद से आता है, नक्षत्र से नहीं। एक ही नक्षत्र के चार पदों के चार अलग अक्षर होते हैं।
इसलिए अगर जन्म समय अनुमान से लिया गया हो और चंद्रमा पद की सीमा के आसपास हो, तो अक्षर बदल सकता है।
चंद्रमा एक दिन में लगभग तेरह अंश चलता है, तो 3 अंश 20 कला का एक पद पार करने में उसे लगभग छह घंटे लगते हैं। जन्म समय में छह घंटे की गलती दुर्लभ है, इसलिए यह गणना ज़्यादातर मामलों में स्थिर रहती है।
यह स्थिरता लग्न के साथ नहीं मिलती। लग्न घंटे भर में लगभग पंद्रह अंश चलता है, इसलिए लग्न का पद हर तेरह मिनट के आसपास बदल जाता है। इसीलिए चंद्रमा का पद और लग्न का पद, दोनों पर एक जैसा भरोसा नहीं किया जा सकता।
पद को व्यवहार में कैसे पढ़ें
मेरा क्रम छोटा है। पहले नक्षत्र देखिए, क्योंकि वही दशा-क्रम तय करता है और वही स्वभाव की मोटी रेखा देता है।
उसके बाद पद देखिए और उससे नवांश राशि निकालिए, क्योंकि वहीं से पता चलता है कि वह ग्रह गहराई में जाकर किस स्वामी के हाथ में है। फिर देखिए कि नवांश राशि D1 राशि से मेल खाती है या नहीं, यानी वर्गोत्तम बना या नहीं।
और आख़िर में एक चेतावनी जो मैं हर बार दोहराता हूँ। पद एक माप है, कोई फ़ैसला नहीं। वह बताता है कि ग्रह किस बारीक खाने में बैठा है, और उस खाने का शास्त्रीय अर्थ क्या है। वह यह नहीं बताता कि किसी के साथ क्या होगा, और जो पन्ना ऐसा दावा करे, वह गणना से आगे निकल चुका है।
एक नक्षत्र में कितने पद होते हैं?
चार। हर नक्षत्र 13 अंश 20 कला चौड़ा है और उसे चार बराबर हिस्सों में बाँटने पर हर पद 3 अंश 20 कला का बनता है। 27 नक्षत्र गुणा चार पद बराबर कुल 108 पद।
क्या पद और नवांश एक ही चीज़ हैं?
माप के हिसाब से हाँ। दोनों 3 अंश 20 कला के हैं। नक्षत्र की तरफ़ से गिनने पर उसे पद कहते हैं और राशि की तरफ़ से गिनने पर नवांश। किसी ग्रह का पद जान लेने का मतलब है कि उसकी नवांश राशि भी जान ली।
एक राशि में कितने पद आते हैं?
ठीक नौ। राशि 30 अंश की है और पद 3 अंश 20 कला का, तो नौ पद पूरे बैठते हैं। बारह राशियाँ गुणा नौ पद बराबर 108, जो 27 गुणा 4 से मिलने वाली संख्या ही है।
क्या एक ही नक्षत्र के चारों पद एक जैसे होते हैं?
नहीं। नक्षत्र स्वामी चारों में एक ही रहता है, पर हर पद अलग नवांश राशि में गिरता है और उसका स्वामी अलग होता है। अश्विनी के चार पद क्रमशः मेष, वृषभ, मिथुन और कर्क नवांश में पड़ते हैं, यानी मंगल, शुक्र, बुध और चंद्रमा के अधीन।
कौन से नक्षत्र दो राशियों में बँटे होते हैं?
सत्ताईस में से नौ। कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा और पूर्वाभाद्रपद। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि 30 अंश की राशि में 13 अंश 20 कला का नक्षत्र सवा दो बार ही आता है।
जन्म समय की गलती से पद बदल जाता है क्या?
चंद्रमा के मामले में यह मुश्किल है, क्योंकि चंद्रमा को एक पद पार करने में लगभग छह घंटे लगते हैं। लग्न के मामले में यह आसानी से हो जाता है, क्योंकि लग्न का पद हर तेरह मिनट के आसपास बदलता है। इसलिए लग्न से जुड़ी पद-गणना के लिए सही जन्म समय ज़रूरी है।

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