राहु काल: सूर्योदय से गिनने का असली तरीका

किसी भी हिंदी वेबसाइट पर राहु काल खोजिए और आपको एक साफ सुथरी तालिका मिल जाएगी। सोमवार सुबह साढ़े सात से नौ, मंगलवार दोपहर तीन से साढ़े चार, शनिवार नौ से साढ़े दस। लोग इसे स्क्रीनशॉट लेकर रख लेते हैं और सालों तक वही समय मानते रहते हैं।

वह तालिका पूरी तरह गलत नहीं है। वह एक खास स्थिति की तालिका है, जहाँ सूर्योदय ठीक छह बजे और सूर्यास्त ठीक छह बजे मान लिया गया हो। भारत में ऐसा साल में दो दिन के आसपास ही होता है, और तब भी सिर्फ कुछ देशांतरों पर। बाकी 363 दिन वह तालिका आपके शहर के लिए दस से चालीस मिनट तक खिसकी हुई होती है।

असली नियम मुहूर्त चिंतामणि के काल विभाग वाले हिस्से में है, और वह घड़ी से नहीं, सूर्य से चलता है।

राहु काल: सूर्योदय से गिनने का असली तरीका

राहु काल की असली गणना

नियम एक वाक्य का है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिनमान कहते हैं। उस दिनमान को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है। वार के अनुसार इनमें से एक भाग राहु काल कहलाता है।

यानी हर भाग की लंबाई दिनमान का आठवाँ हिस्सा है। अगर आपके शहर में उस दिन दिनमान 12 घंटे का है तो हर भाग ठीक 90 मिनट का होगा।

दिसंबर में उत्तर भारत में दिनमान लगभग साढ़े दस घंटे रह जाता है, तब हर भाग लगभग 79 मिनट का होता है। जून में दिनमान लगभग चौदह घंटे का होता है, तब हर भाग लगभग 105 मिनट का हो जाता है।

तो राहु काल की अवधि भी बदलती है और उसका आरंभ समय भी। डेढ़ घंटा हर दिन के लिए सही मान लेना गणना नहीं, आदत है।

वार के अनुसार कौन सा भाग

दिन के आठ भागों को क्रम से गिनिए, पहला भाग सूर्योदय से शुरू होता है। पहला भाग कभी राहु काल नहीं होता, यह याद रखने लायक है।

  • सोमवार, दूसरा भाग
  • शनिवार, तीसरा भाग
  • शुक्रवार, चौथा भाग
  • बुधवार, पाँचवाँ भाग
  • गुरुवार, छठा भाग
  • मंगलवार, सातवाँ भाग
  • रविवार, आठवाँ भाग

इसी क्रम से वे प्रचलित घड़ी समय निकलते हैं जो तालिकाओं में छपते हैं। सोमवार का दूसरा भाग छह बजे सूर्योदय मानने पर साढ़े सात से नौ बजता है।

पर अगर आपके शहर में सूर्योदय 6:42 पर है और सूर्यास्त 5:48 पर, तो दिनमान 11 घंटे 6 मिनट का हुआ, हर भाग लगभग 83 मिनट का, और दूसरा भाग 8:05 के आसपास शुरू होगा। तालिका आपको 7:30 बताती रहेगी।

सबसे बड़ी गलतफहमी यही है

हिंदी की सूचियों में यह गलती अंग्रेजी से भी ज़्यादा फैली हुई है, क्योंकि वही सात पंक्तियों वाली तालिका दशकों से एक साइट से दूसरी साइट पर चिपकती चली आ रही है। किसी ने यह नहीं लिखा कि वह तालिका एक मान ली गई स्थिति के लिए है।

जाँचने का तरीका सीधा है। अपने शहर का उस दिन का सूर्योदय और सूर्यास्त लीजिए, अंतर निकालिए, आठ से भाग दीजिए, और अपने वार वाले भाग तक गिन लीजिए। अगर यह उत्तर छपी हुई तालिका से मेल खाता है, बढ़िया। ज़्यादातर दिनों में नहीं खाएगा।

आकाश के राहु से इसका कोई संबंध नहीं है

यह बात शायद ही कोई कहता है, और यह ज़रूरी है।

राहु काल का राहु की वास्तविक आकाशीय स्थिति से कोई गणनात्मक संबंध नहीं है। राहु चंद्रमा की कक्षा का उत्तरी पात बिंदु है और लगभग 18.6 वर्ष में पूरा चक्र लगाता है। राहु काल इस बिंदु की स्थिति देखता ही नहीं। वह केवल वार और दिनमान के आठवें भाग से निकलता है।

इसका मतलब यह है कि दो अलग-अलग तरह की चीज़ें एक ही नाम से चलती हैं। एक तरफ आपकी कुंडली का राहु है, जिसकी राशि, भाव और राहु महादशा गणना से निकलती है। दूसरी तरफ राहु काल है, जो दिन का एक खंड मात्र है। इन दोनों को आपस में जोड़कर डर पैदा करना आम है, पर गणित में ये जुड़े हुए नहीं हैं।

गुलिक और यमगण्ड, वही गणित

वही आठ भाग वाला विभाजन दो और कालखंड देता है। यमगण्ड और गुलिक, जिसे माँदी भी कहा जाता है। तीनों एक ही दिनमान विभाजन से निकलते हैं, बस वार के अनुसार भाग का क्रम अलग है।

दिलचस्प बात यह है कि शास्त्रीय जातक साहित्य में गुलिक का उपयोग राहु काल से कहीं ज़्यादा है। गुलिक को शनि का उपग्रह माना जाता है और कुछ परंपराओं में उसे कुंडली में एक बिंदु की तरह स्थापित करके पढ़ा जाता है। राहु काल, इसके उलट, मुख्यतः मुहूर्त परंपरा का व्यावहारिक नियम है और दक्षिण भारत में इसका प्रचलन उत्तर से पुराना और गहरा है।

तो जो लोग राहु काल को सबसे बड़ा नियम मानकर चलते हैं, वे असल में एक सहायक नियम को मुख्य नियम बना रहे हैं।

रात का हिस्सा, जो कोई नहीं छापता

दिनमान की तरह रात्रिमान भी होता है, सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक। उसे भी आठ भागों में बाँटा जाता है और उसका भी अपना वार क्रम होता है।

लगभग कोई सूची यह नहीं छापती। कारण साफ है, लोग शुभ काम दिन में करते हैं, इसलिए माँग नहीं है। पर इससे यह समझ बनती है कि पूरा ढाँचा एक ही है, दिन और रात दोनों को आठ भागों में बाँटने वाला काल विभाग। राहु काल उस ढाँचे का एक टुकड़ा है, कोई अकेला रहस्य नहीं।

मुहूर्त में इसका असली वज़न कितना है

यहाँ मुझे साफ रहना है। राहु काल एक मोटी छलनी है, बारीक नहीं।

शास्त्रीय मुहूर्त चयन में सबसे भारी वज़न तिथि, नक्षत्र, योग, करण और लग्न को मिलता है, और उसके बाद कार्य के अनुसार विशेष योगों की जाँच होती है। इन सबके सामने राहु काल एक अतिरिक्त पसंद है, टालने लायक समय, अनिवार्य निषेध नहीं। पुराने मुहूर्त ग्रंथों में इसका स्थान भी इतना ही है।

इसलिए यह वाक्य कि राहु काल में शुरू किया हुआ काम बर्बाद हो जाएगा, शास्त्र से नहीं आता। जो चीज़ शास्त्र में एक प्राथमिकता है, उसे डर में बदल देना बाज़ार का काम है। इस साइट पर मैं वह नहीं करूँगा।

अगर आपके पास चुनने की सुविधा है, राहु काल टाल दीजिए। अगर ट्रेन उसी समय की है, ट्रेन पकड़िए।

कुंडली का राहु अलग विषय है

जिन लोगों की असली दिलचस्पी राहु में है, उनके लिए काम की चीज़ राहु काल नहीं, कुंडली में राहु की स्थिति और उसकी दशा है। लग्न में राहु का पढ़ना एक पूरा विषय है, और विंशोत्तरी दशा का ढाँचा यह बताता है कि राहु की अवधि आपके जीवन में कब चल रही है।

इसी तरह शनि महादशा की गणना भी वहीं से आती है, न कि किसी दैनिक तालिका से।

राहु काल एक दैनिक सुविधा है। कुंडली का राहु एक स्थायी गणना है। दोनों को एक मानने से ही ज़्यादातर भ्रम पैदा होता है।

राहु काल की गणना कैसे होती है?

सूर्योदय से सूर्यास्त तक के दिनमान को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है, और वार के अनुसार उनमें से एक भाग राहु काल होता है। सोमवार दूसरा, शनिवार तीसरा, शुक्रवार चौथा, बुधवार पाँचवाँ, गुरुवार छठा, मंगलवार सातवाँ और रविवार आठवाँ भाग।

क्या राहु काल हर दिन डेढ़ घंटे का होता है?

नहीं। वह दिनमान का आठवाँ हिस्सा है, इसलिए उसकी लंबाई मौसम और अक्षांश के साथ बदलती है। सर्दियों में यह लगभग अस्सी मिनट तक सिमट सकता है और गर्मियों में लगभग एक सौ पाँच मिनट तक फैल सकता है।

क्या इंटरनेट पर छपी राहु काल तालिका सही है?

वह छह बजे सूर्योदय और छह बजे सूर्यास्त मानकर बनाई गई होती है। आपके शहर का असली सूर्योदय अलग होता है, इसलिए ज़्यादातर दिनों में वह तालिका दस से चालीस मिनट तक खिसकी रहती है। सही समय अपने शहर के सूर्योदय और सूर्यास्त से निकालना चाहिए।

क्या राहु काल का संबंध कुंडली के राहु से है?

गणना के स्तर पर नहीं। राहु काल केवल वार और दिनमान से निकलता है और आकाश में राहु की वास्तविक स्थिति देखता ही नहीं। कुंडली का राहु एक अलग गणना है, जिसमें उसकी राशि, भाव और दशा देखी जाती है।

क्या राहु काल में शुरू किया काम असफल हो जाता है?

शास्त्रीय मुहूर्त परंपरा ऐसा नहीं कहती। वहाँ तिथि, नक्षत्र, योग, करण और लग्न का वज़न कहीं ज़्यादा है और राहु काल एक अतिरिक्त पसंद के दर्जे पर है। इसे अनिवार्य निषेध की तरह बेचना बाद की प्रथा है, मूल नियम नहीं।

गुलिक काल और यमगण्ड क्या हैं?

ये भी उसी आठ भाग वाले दिनमान विभाजन से निकलने वाले कालखंड हैं, बस वार के अनुसार भाग का क्रम अलग है। गुलिक, जिसे माँदी कहते हैं, शास्त्रीय जातक साहित्य में राहु काल से अधिक प्रयोग होता है।

Aditya Sharma

लेखक

Aditya Sharma

मैंने Karma Jyotisha इसलिए बनाया क्योंकि ज्यादातर “AI ज्योतिष” साइट्स बस अंदाजा लगाते हैं। यह साइट वास्तविक विंशोत्तरी दशा और नक्षत्र गणना महर्षि पराशर के BPHS से करती है — गणना की गई, अंदाजा नहीं। मैं एक इंजीनियर हूं, पेशेवर ज्योतिषी नहीं — इसलिए इसे एक गणना-उपकरण मानता हूं, भविष्यवाणी नहीं — और यह हर पेज पर साफ़ लिखता हूं।

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