गुण मिलान की रिपोर्ट में आठ कूट होते हैं और उनमें से एक पर लोगों की नज़र सबसे पहले जाती है। योनि कूट। नाम की वजह से इसके बारे में सबसे ज़्यादा अटकलें लगती हैं और सबसे ज़्यादा गलत बातें कही जाती हैं।
असल में योनि कूट एक जानवरों की तालिका है। सत्ताईस नक्षत्रों में से हर एक को एक पशु वर्ग दिया गया है, और मिलान इस बात से होता है कि दोनों पक्षों के पशु आपस में कैसे रहते हैं। यहाँ योनि शब्द का अर्थ जाति या वर्ग है, यानी किस मूल श्रेणी से आना।
यह कूट कुल छत्तीस गुणों में से चार गुणों का है। इस पोस्ट में पूरी तालिका है, अंक देने का नियम है, और वह एक बात है जो लगभग किसी हिंदी लेख में नहीं मिलती।
छत्तीस गुणों में योनि कूट की जगह
अष्टकूट मिलान में आठ कूट हैं और हर एक का अलग भार है। वर्ण एक, वश्य दो, तारा तीन, योनि चार, ग्रह मैत्री पाँच, गण छह, भकूट सात और नाड़ी आठ। जोड़ने पर छत्तीस बनते हैं।
ध्यान दीजिए कि योनि चौथे नंबर पर है और उसका भार चार है। यानी अगर योनि कूट में शून्य आ जाए तो कुल छत्तीस में से चार अंक कम होते हैं, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।
भकूट में सात और नाड़ी में आठ अंक दाँव पर होते हैं, इसलिए शास्त्रीय भार के हिसाब से वे दोनों योनि से भारी हैं। पूरी अष्टकूट प्रणाली किस क्रम से चलती है, यह गुण मिलान के छत्तीस गुण वाली पोस्ट में विस्तार से है।
चौदह योनि और सत्ताईस नक्षत्र
चौदह पशु वर्ग हैं और सत्ताईस नक्षत्र। तालिका इस तरह बनती है।
- अश्व: अश्विनी, शतभिषा
- गज: भरणी, रेवती
- मेष: कृत्तिका, पुष्य
- सर्प: रोहिणी, मृगशिरा
- श्वान: मूल, आर्द्रा
- मार्जार: पुनर्वसु, आश्लेषा
- मूषक: मघा, पूर्वा फाल्गुनी
- गौ: उत्तरा फाल्गुनी, उत्तरा भाद्रपदा
- महिष: हस्त, स्वाति
- व्याघ्र: चित्रा, विशाखा
- मृग: अनुराधा, ज्येष्ठा
- वानर: पूर्वाषाढ़ा, श्रवण
- सिंह: धनिष्ठा, पूर्वा भाद्रपदा
- नकुल: उत्तराषाढ़ा
हर योनि का एक लिंग भी होता है, नर या मादा, जो नक्षत्र के साथ तय है। कुछ परंपराएँ एक ही योनि के भीतर लिंग को भी गिनती हैं और कुछ नहीं गिनतीं।
जो परंपराएँ इसे गिनती हैं, वे इतना ही कहती हैं कि वर की योनि नर वर्ग की और वधू की योनि मादा वर्ग की हो तो बेहतर माना जाता है, और इसे मुख्य चार अंकों वाली गणना से अलग एक सहायक संकेत माना जाता है, स्वतंत्र निर्णायक नियम नहीं।
इस सहायक बात को किस एक श्लोक में सबसे पहले रखा गया, यह अलग-अलग टीकाओं में अलग-अलग बताया जाता है, इसलिए मैं यहाँ कोई एक श्लोक संख्या तय करके नहीं लिखूँगा।
अंक कैसे मिलते हैं
अंक देने का नियम पाँच स्तर का है और यह पूरी तरह दोनों योनियों के आपसी संबंध पर टिका है।
- चार अंक: दोनों की योनि एक ही हो।
- तीन अंक: दोनों योनियाँ मित्र मानी जाती हों।
- दो अंक: दोनों का संबंध सम या तटस्थ हो।
- एक अंक: दोनों योनियाँ शत्रु मानी जाती हों।
- शून्य: दोनों का संबंध वध का हो, यानी परम शत्रु।
पूरे मिलान में यही एकमात्र कूट है जिसमें पाँच अलग स्तर हैं। बाकी कई कूट या तो पूरा अंक देते हैं या शून्य। यह क्रम बताता है कि यह कूट किसी एक रेखा से पास या फेल का फ़ैसला करने के लिए नहीं बना, वह स्वभाव की दूरी को नापने के लिए बना है।
सात वध जोड़ियाँ
चौदह योनियाँ हैं और उनमें सात जोड़ियाँ ऐसी हैं जिन्हें परस्पर वध कहा गया है। इन्हीं में शून्य आता है।
- अश्व और महिष
- गज और सिंह
- मेष और वानर
- सर्प और नकुल
- श्वान और मृग
- मार्जार और मूषक
- गौ और व्याघ्र
यह सूची देखते ही एक बात साफ़ हो जाती है। हर जोड़ी प्रकृति में शिकारी और शिकार की जोड़ी है। बिल्ली और चूहा, कुत्ता और हिरण, बाघ और गाय, नेवला और साँप।
यह कोई गुप्त संकेत नहीं है, यह एक साफ़ चित्र है, और चित्र ही इस कूट का पूरा तर्क है। शास्त्र यह कह रहा है कि दो स्वभाव ऐसे हो सकते हैं जिनमें एक की सहज प्रतिक्रिया दूसरे को असहज कर देती है।
नकुल योनि: वह अकेली योनि
अब वह बात जो शायद ही कहीं लिखी मिलती है। ऊपर की तालिका ध्यान से गिनिए। तेरह योनियों के दो दो नक्षत्र हैं, यानी छब्बीस। और नकुल योनि का सिर्फ़ एक नक्षत्र है, उत्तराषाढ़ा। छब्बीस और एक मिलकर सत्ताईस।
इसका सीधा नतीजा यह है कि उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति को कभी भी योनि कूट में चार अंक नहीं मिल सकते। एक ही योनि वाला दूसरा नक्षत्र मौजूद ही नहीं है। यह पूरे अष्टकूट में अपनी तरह की अकेली स्थिति है।
दूसरा नतीजा और दिलचस्प है। नकुल की वध जोड़ी सर्प है, और सर्प योनि के दो नक्षत्र हैं, रोहिणी और मृगशिरा।
यानी उत्तराषाढ़ा वाले व्यक्ति के लिए शून्य आने की संभावना उन दो नक्षत्रों तक सीमित है, जबकि उसके लिए चार अंक का दरवाज़ा हमेशा बंद है। रोहिणी नक्षत्र का स्वभाव किस तरह पढ़ा जाता है, यह चंद्र रोहिणी पाद 1 वाली पोस्ट में देखा जा सकता है।
मैं यह बात इसलिए बता रहा हूँ कि यह तालिका की एक बनावटी असमानता है और इसे जाने बिना लोग उत्तराषाढ़ा वाली कुंडलियों में कम योनि अंक देखकर घबरा जाते हैं। वहाँ अधिकतम संभव अंक ही तीन है।
सबसे आम गलत व्याख्या
सबसे बड़ी गलतफहमी नाम से पैदा होती है। लोग योनि शब्द को शारीरिक अर्थ में पढ़ लेते हैं और मान लेते हैं कि यह कूट केवल शारीरिक संबंध की जाँच है। फिर शून्य आने पर पूरी बात वहीं अटक जाती है।
शास्त्रीय अर्थ में योनि का मतलब उद्भव, जाति या वर्ग है। अष्टकूट में यह कूट सहज स्वभाव और प्रवृत्ति के मेल की जाँच है, यानी दबाव में दो लोग किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं।
बाघ वाला स्वभाव सीधे टकराता है और गाय वाला स्वभाव पीछे हटता है। दोनों में कोई बुरा नहीं है और दोनों की प्रतिक्रिया एक दूसरे के लिए थकाने वाली हो सकती है।
दूसरी गलतफहमी यह है कि योनि में शून्य आते ही रिश्ता खारिज कर दिया जाता है। यह भार के हिसाब से गलत है। चार अंक कट रहे हैं, बत्तीस बाकी हैं। शास्त्रीय क्रम में भकूट और नाड़ी का भार इससे ज़्यादा है, और उनके अपने भंग नियम भी हैं, जो भकूट दोष और नाड़ी दोष वाली पोस्टों में खुले हुए हैं।
योनि कूट अकेले क्या नहीं बता सकता
एक बात साफ़ रखनी चाहिए। पूरा अष्टकूट मिलान चंद्र नक्षत्र और चंद्र राशि पर खड़ा है। दोनों कुंडलियों में केवल चंद्रमा की स्थिति इस्तेमाल होती है।
इसका मतलब यह है कि छत्तीस में से मिले अंक सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र, मंगल और दशा क्रम के बारे में कुछ नहीं कहते। दो लोगों का अष्टकूट अंक ऊँचा हो सकता है और उनकी कुंडलियों का बाकी ढाँचा बिल्कुल अलग कहानी कह रहा हो।
उल्टा भी उतना ही सच है। मंगल दोष के आसपास की उलझन इसी अधूरे पढ़ने से पैदा होती है, जिस पर मंगल दोष का सच वाली पोस्ट अलग से लिखी गई है।
इसलिए योनि कूट को उसके आकार में रखिए। यह छत्तीस में से चार अंक की एक जाँच है, जो स्वभाव की एक विशेष परत को नापती है। यह एक उपकरण है और उपकरण से जितना निकलता है उतना ही लेना चाहिए। जो कोई इस एक संख्या से किसी रिश्ते का भविष्य बता रहा है, वह गणना से आगे की बात कर रहा है।
योनि कूट में कुल कितने अंक होते हैं?
चार। छत्तीस गुणों के अष्टकूट में योनि का भार चार है। इसमें शून्य आने पर कुल में से चार अंक कम होते हैं और बत्तीस बचे रहते हैं।
चौदह योनियाँ कौन सी हैं?
अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, गौ, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, सिंह और नकुल। सत्ताईस नक्षत्रों को इन्हीं चौदह वर्गों में बाँटा गया है।
शून्य अंक किन जोड़ियों में आता है?
सात वध जोड़ियों में। अश्व और महिष, गज और सिंह, मेष और वानर, सर्प और नकुल, श्वान और मृग, मार्जार और मूषक, तथा गौ और व्याघ्र। हर जोड़ी प्रकृति में शिकारी और शिकार की जोड़ी है।
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में चार अंक क्यों नहीं मिल सकते?
क्योंकि नकुल योनि का केवल एक ही नक्षत्र है, उत्तराषाढ़ा। बाकी तेरह योनियों के दो दो नक्षत्र हैं। एक ही योनि वाला दूसरा नक्षत्र मौजूद न होने से इस नक्षत्र के लिए अधिकतम संभव अंक तीन रह जाता है।
क्या योनि कूट केवल शारीरिक मेल की जाँच है?
नहीं। शास्त्रीय अर्थ में योनि का मतलब जाति या वर्ग है। यह कूट सहज स्वभाव और प्रवृत्ति के मेल को नापता है, यानी दबाव में दो लोग किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं।
क्या अष्टकूट का अंक पूरी कुंडली मिलान है?
नहीं। पूरा अष्टकूट केवल दोनों के चंद्र नक्षत्र और चंद्र राशि से बनता है। सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र, मंगल और दशा क्रम इसमें आते ही नहीं, इसलिए यह एक परत है और पूरी तस्वीर नहीं।

टिप्पणियाँ
अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहली आपकी हो सकती है।
टिप्पणी लिखें
प्रकाशित होने से पहले समीक्षा की जाती है। आपका ईमेल कभी प्रकाशित नहीं होता।