अगर आपने कभी किसी बुज़ुर्ग से पूछा हो कि शुभ समय नहीं मिल रहा तो क्या करें, तो जवाब में सबसे ज़्यादा जो एक शब्द सुनाई देता है वह है अभिजित। कोई पंचांग खुलेगा नहीं, कोई गणना नहीं होगी, बस इतना कहा जाएगा कि दोपहर में कर लो, अभिजित में सब चलता है।
यह बात मूल रूप में सही है। मुहूर्त शास्त्र अभिजित को वही दर्जा देता है, एक ऐसा समय जो अन्यथा अनुपयुक्त काल के बहुत से दोषों को काट देता है।
दिक्कत यह है कि लोग इसे घड़ी का एक निश्चित अंक समझ लेते हैं, और यहीं से गलती शुरू होती है। अभिजित हर शहर में अलग समय पर पड़ता है, और एक दिन ऐसा भी है जब यह लिया ही नहीं जाता।
अभिजित मुहूर्त है क्या
सूर्योदय से सूर्यास्त तक के काल को पंद्रह बराबर भागों में बाँटा जाता है। हर भाग एक मुहूर्त कहलाता है। अभिजित इनमें आठवाँ है, यानी ठीक बीच वाला। सात मुहूर्त उससे पहले, सात उसके बाद।
बीच वाला होने का सीधा अर्थ यह है कि अभिजित का मध्य बिंदु स्थानीय मध्याह्न पर पड़ता है, उस क्षण पर जब सूर्य उस स्थान के आकाश में सबसे ऊँचा होता है। नाम भी यही कहता है। अभिजित का अर्थ है जिसे जीता न जा सके, और परंपरा इसे सूर्य के सर्वोच्च बिंदु से जोड़ती है।
गणना: कागज़ पर यह कैसे निकलता है
गणित बहुत सरल है और आप इसे खुद कर सकते हैं।
- अपने शहर का सूर्योदय और सूर्यास्त लीजिए।
- दोनों के बीच का अंतर निकालिए। यही दिनमान है।
- दिनमान को पंद्रह से भाग दीजिए। यह एक मुहूर्त की लंबाई है।
- सूर्योदय में इस लंबाई का सात गुना जोड़िए। वहाँ से अभिजित शुरू होता है और एक मुहूर्त तक चलता है।
उदाहरण से देखिए। मान लीजिए सूर्योदय छह बजे है और सूर्यास्त शाम छह बजे, यानी दिनमान बारह घंटे। एक मुहूर्त हुआ अड़तालीस मिनट। सात मुहूर्त हुए पाँच घंटे छत्तीस मिनट। तो अभिजित 11:36 से 12:24 तक रहेगा, और उसका मध्य ठीक बारह बजे पड़ेगा।
ध्यान दीजिए कि अड़तालीस मिनट वाला आँकड़ा तभी आता है जब दिन ठीक बारह घंटे का हो। सर्दियों में दिन छोटा होता है, इसलिए मुहूर्त भी छोटा होता है, कभी चालीस मिनट के आसपास। गर्मियों में यह पचास मिनट से ऊपर चला जाता है। पंचांग के इन आधारभूत अंगों को मैंने पंचांग के पाँच अंगों वाले लेख में खोलकर लिखा है।
सबसे आम गलती: इसे घड़ी का निश्चित समय मान लेना
इंटरनेट पर सबसे ज़्यादा जो पंक्ति दोहराई जाती है वह यह है कि अभिजित 11:48 से 12:36 तक होता है। यह किसी एक स्थान, किसी एक दिन का उत्तर है, और उसे पूरे देश पर चिपका दिया गया है।
भारत में यह गलती और भी बड़ी हो जाती है, क्योंकि पूरा देश एक ही घड़ी पर चलता है जबकि देशांतर में बहुत फैला हुआ है। भारतीय मानक समय 82.5 अंश पूर्व देशांतर पर आधारित है। कोलकाता उससे पूर्व में है, अहमदाबाद उससे काफ़ी पश्चिम में।
इसका परिणाम यह है कि इन दोनों शहरों में स्थानीय मध्याह्न घड़ी के हिसाब से लगभग एक घंटे के अंतर पर आता है। यानी जिस समय कोलकाता में अभिजित समाप्त हो चुका होता है, अहमदाबाद में वह शुरू भी नहीं हुआ होता।
इसलिए अभिजित का समय हमेशा अपने शहर के सूर्योदय और सूर्यास्त से निकालिए। किसी सामान्य सूची से उठाया गया समय आपके लिए गलत होने की पूरी संभावना रखता है।
बुधवार वाला अपवाद
यह वह बात है जो अधिकतर जगह छूट जाती है। मुहूर्त परंपरा में बुधवार को अभिजित मुहूर्त नहीं लिया जाता। बाकी छह वारों में यह स्वीकार्य है, बुधवार को इसका उपयोग वर्जित माना गया है।
तो बुधवार को क्या करें। तब सामान्य नियम पर लौटना होता है, यानी तिथि, नक्षत्र, योग और करण देखकर कोई दूसरा उपयुक्त काल चुनना। बुध का स्वभाव और उसकी अवधि किस तरह काम करती है, यह बुध महादशा वाले लेख में अलग से समझाया गया है।
दूसरा अपवाद: दक्षिण दिशा की यात्रा
दूसरा अपवाद यात्रा से जुड़ा है। परंपरा में कहा गया है कि अभिजित मुहूर्त दक्षिण दिशा की यात्रा के लिए उपयुक्त नहीं है। शेष दिशाओं की यात्रा में इसे लिया जा सकता है।
यह अपवाद इसलिए दिलचस्प है कि यह दिखाता है अभिजित कोई सर्वव्यापी छूट नहीं है। इसके अपने दायरे हैं, और शास्त्र ने वे दायरे साफ़ शब्दों में बताए हैं। जो लोग अभिजित को हर स्थिति की चाबी बनाकर बेचते हैं, वे इन दो पंक्तियों को छोड़ देते हैं।
यह किन दोषों को काटता है और किन्हें नहीं
अभिजित के बारे में जो कहा गया है वह यह है कि वह अन्यथा अनुपयुक्त काल के अनेक दोषों को शांत कर देता है।
इसीलिए जब कोई अच्छा मुहूर्त उपलब्ध न हो, या कोई काम टाला न जा सकता हो, तो इसे विकल्प के रूप में सुझाया जाता है। घटस्थापना में भी यही विकल्प दिया गया है जब वर्जित नक्षत्र या योग पूरे प्रातःकाल पर बैठ जाए।
यहाँ एक ईमानदार सीमा भी बतानी चाहिए। कुछ भारी निषेधों पर, जैसे विष्टि करण या रिक्ता तिथि, अलग अलग परंपराएँ अलग निर्णय देती हैं। कुछ ग्रंथ अभिजित को वहाँ भी पर्याप्त मानते हैं, कुछ नहीं। यह मतभेद वास्तविक है और मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। जहाँ परंपराएँ बँटी हों, वहाँ अपनी कुल परंपरा का पालन करना सबसे सीधा रास्ता है।
जो कम कहा जाता है: अभिजित नक्षत्र अलग चीज़ है
यह वह बात है जो लगभग कहीं नहीं लिखी मिलती। अभिजित नाम का एक नक्षत्र भी है, अट्ठाईसवाँ, जो उत्तराषाढ़ा के अंतिम चरण और श्रवण के आरम्भ के बीच मकर राशि में एक छोटे खंड पर बैठता है। सत्ताईस नक्षत्रों वाली सामान्य गणना में इसे नहीं गिना जाता, इसीलिए विंशोत्तरी दशा में इसका कोई स्वामी नहीं होता।
अभिजित मुहूर्त और अभिजित नक्षत्र, दोनों का नाम एक है और दोनों का आधार अलग है। मुहूर्त सूर्य की दैनिक गति से निकलता है, नक्षत्र चंद्र के राशि भ्रमण से। लोग अक्सर इन्हें एक मान लेते हैं और फिर पूछते हैं कि उनकी कुंडली में अभिजित है या नहीं। दोनों सवाल अलग हैं।
इसे व्यवहार में कैसे इस्तेमाल करें
मेरा अपना तरीका सीधा है। पहले सामान्य नियम से मुहूर्त देखिए। जो काम टाला जा सकता है, उसे उपयुक्त काल में रखिए। जो काम टाला नहीं जा सकता, उसके लिए अभिजित एक उचित सहारा है, बशर्ते वह बुधवार न हो और यात्रा दक्षिण दिशा की न हो।
और एक बात साफ़ रहनी चाहिए। मुहूर्त परिणाम की गारंटी नहीं देता। वह कर्म को अनुकूल परिस्थिति में रखने का प्रयास है, और शास्त्र इससे आगे कोई वादा नहीं करता।
जो कोई कहे कि सही मुहूर्त से काम अवश्य सफल होगा, या गलत मुहूर्त से हानि निश्चित है, वह अपनी बात कह रहा है। इस साइट पर न कोई उपाय बेचा जाता है, न कोई रत्न, इसलिए यह कहने में मुझे कोई असुविधा नहीं है।
यदि आप गोचर और दशा का ढाँचा भी साथ में देखना चाहें तो साढ़ेसाती और चंद्र महादशा वाले लेख उसी क्रम में पढ़े जा सकते हैं।
अभिजित मुहूर्त कितने बजे होता है?
इसका कोई एक निश्चित समय नहीं है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के काल को पंद्रह से भाग दीजिए और सूर्योदय में उसका सात गुना जोड़िए, वहीं से अभिजित शुरू होता है। बारह घंटे के दिन में यह लगभग 11:36 से 12:24 तक पड़ेगा, पर आपके शहर और मौसम के हिसाब से यह बदलता रहेगा।
क्या बुधवार को अभिजित मुहूर्त लिया जा सकता है?
परंपरा में बुधवार को अभिजित मुहूर्त वर्जित माना गया है। शेष छह वारों में यह स्वीकार्य है। बुधवार को सामान्य नियम से, यानी तिथि, नक्षत्र, योग और करण देखकर कोई दूसरा उपयुक्त काल चुनना होता है।
अभिजित मुहूर्त कितनी देर का होता है?
यह दिनमान के पंद्रहवें भाग के बराबर होता है। बारह घंटे के दिन में लगभग अड़तालीस मिनट। सर्दियों में दिन छोटा होने से यह घटकर चालीस मिनट के आसपास आ सकता है और गर्मियों में पचास मिनट से ऊपर जा सकता है।
क्या अभिजित हर दोष काट देता है?
इसे अनेक दोषों को शांत करने वाला कहा गया है, फिर भी यह असीमित छूट नहीं है। दक्षिण दिशा की यात्रा में इसका निषेध है और बुधवार को इसे लिया नहीं जाता। विष्टि करण जैसे कुछ भारी निषेधों पर परंपराओं में मतभेद है, और यह मतभेद वास्तविक है।
अभिजित नक्षत्र और अभिजित मुहूर्त में क्या अंतर है?
अभिजित नक्षत्र अट्ठाईसवाँ नक्षत्र है, जो मकर राशि में उत्तराषाढ़ा के अंत और श्रवण के आरम्भ के बीच एक छोटे खंड पर पड़ता है। अभिजित मुहूर्त दिन का आठवाँ मुहूर्त है और सूर्य की दैनिक गति से निकलता है। नाम एक है, आधार अलग है।
क्या सही मुहूर्त से काम की सफलता निश्चित हो जाती है?
नहीं। मुहूर्त का उद्देश्य कर्म को अनुकूल परिस्थिति में रखना है और शास्त्र इससे आगे कोई वादा नहीं करता। परिणाम की गारंटी देने वाला या देर हो जाने पर भय दिखाने वाला कोई भी दावा शास्त्र से आगे की बात है।

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