गुरु पूर्णिमा 2027: आषाढ़ की पूर्णिमा और अधिक मास का असर

हर साल जुलाई आते-आते एक ही सवाल दोहराता है। पिछले साल गुरु पूर्णिमा किसी और तारीख़ को थी, इस साल किसी और को, और कभी-कभी तो पूरा महीना ही बदल जाता है।

लोग मान लेते हैं कि पंचांग बदल गया, या किसी ने गिनती गलत कर दी। दोनों बात गलत हैं। गणना वही है। जो चीज़ बदलती है वह चंद्र वर्ष और सौर वर्ष का फ़र्क़ है, और उस फ़र्क़ को संभालने का तरीक़ा अधिक मास कहलाता है।

इस पोस्ट में तीन चीज़ें हैं। 2027 की तारीख़, वह पूरी वजह जिससे तारीख़ उछलती है, और एक ऐसी बात जो शायद ही कहीं साफ़ लिखी मिलती है कि अमांत और पूर्णिमांत गणना में इस दिन का क्या होता है।

गुरु पूर्णिमा 2027: आषाढ़ की पूर्णिमा और अधिक मास का असर

2027 की तारीख़

गुरु पूर्णिमा 2027 में 18 जुलाई, रविवार को है। तिथि आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा है। यह तारीख़ इसी साइट के गणना इंजन से निकली है और तिथि से अलग से मिलाकर देखी गई है।

एक ज़रूरी बात यहीं कह देता हूँ। पूर्णिमा एक क्षण है, पूरा दिन नहीं। चंद्रमा और सूर्य के बीच का अंतर जिस पल ठीक 180 अंश होता है, उसी पल पूर्णिमा तिथि समाप्त होती है।

व्रत किस दिन माना जाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्षण किस सूर्योदय के बाद और किस से पहले पड़ रहा है। इसीलिए कभी-कभी दो पंचांग एक ही गणना करके भी अलग दिन बताते हैं, और दोनों अपने-अपने नियम से सही होते हैं।

गुरु पूर्णिमा है क्या

यह दिन महर्षि वेद व्यास से जुड़ा है, इसीलिए इसका पुराना नाम व्यास पूर्णिमा है। परंपरा इसे उस दिन के रूप में देखती है जब सीखने वाला अपने सिखाने वाले की तरफ़ मुड़कर देखता है। बौद्ध परंपरा में इसी पूर्णिमा को भगवान बुद्ध के पहले उपदेश से जोड़ा जाता है, और कुछ परंपराओं में यह चातुर्मास की शुरुआत का बिंदु भी है।

ध्यान देने लायक़ बात यह है कि यह पर्व किसी ग्रह-स्थिति पर टिका नहीं है। इसकी शर्त सिर्फ़ तिथि है। आषाढ़ मास, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा तिथि। इससे ज़्यादा कोई खगोलीय शर्त इसमें नहीं जुड़ती।

सबसे आम गलतफ़हमी

यहाँ नाम धोखा दे देता है। बहुत से लोग मान लेते हैं कि गुरु पूर्णिमा का संबंध बृहस्पति ग्रह से है, क्योंकि ज्योतिष में बृहस्पति को गुरु कहते हैं। इस दिन बृहस्पति की स्थिति देखने की सलाह भी अक्सर मिल जाती है।

यहाँ का गुरु शिक्षक है। व्यास हैं, परंपरा है, वह व्यक्ति है जिससे आपने कुछ सीखा। बृहस्पति ग्रह इस पर्व की परिभाषा में कहीं नहीं आता। पूर्णिमा तिथि चंद्रमा और सूर्य के अंतर से बनती है, और उस गणना में बृहस्पति की कोई भूमिका नहीं है। बृहस्पति उस दिन आकाश में कहीं भी हो सकता है, तिथि उससे नहीं बदलेगी।

यह अंतर मुझे इसलिए ज़रूरी लगता है क्योंकि इसी भ्रम पर बहुत सारी सलाह टिकी होती है जिसका शास्त्रीय आधार नहीं है। बृहस्पति ग्रह की अपनी दशा और अपना गोचर होता है, और वह अपने आप में एक पूरा विषय है जिसे मैंने गुरु महादशा में विस्तार से लिखा है। उसका इस पर्व की तारीख़ से कोई लेना-देना नहीं।

अधिक मास: तारीख़ हर साल क्यों खिसकती है

अब असली गणित। चंद्र वर्ष बारह चंद्र मासों का होता है और लगभग 354 दिन लंबा होता है। सौर वर्ष लगभग 365 दिन का होता है। हर साल क़रीब ग्यारह दिन का फ़र्क़ बचता है।

अगर इस फ़र्क़ को यूँ ही छोड़ दिया जाए तो कुछ ही सालों में आषाढ़ बरसात से हटकर सर्दी में पहुँच जाएगा, और हर मास अपनी ऋतु से कट जाएगा। भारतीय पंचांग ऐसा नहीं होने देता।

वह इस फ़र्क़ को जमा होने देता है और जब वह लगभग एक पूरे मास जितना हो जाता है, तब एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ देता है। यही अधिक मास है, जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं।

इसका सीधा नतीजा यह है कि पर्व की तारीख़ अंग्रेज़ी कैलेंडर पर हर साल क़रीब ग्यारह दिन पीछे खिसकती जाती है, और फिर जिस साल अधिक मास आता है, वह एक झटके में लगभग तीस दिन आगे कूद जाती है। यही वह उछाल है जिसे लोग गलती समझ लेते हैं।

कौन सा मास अधिक होगा, यह संक्रांति तय करती है

यह हिस्सा शायद ही कहीं ठीक से समझाया जाता है। अधिक मास मनमाने ढंग से नहीं जोड़ा जाता। उसका नियम एक ही है और वह बहुत साफ़ है।

संक्रांति वह क्षण है जब सूर्य एक राशि छोड़कर अगली राशि में प्रवेश करता है। साल में बारह संक्रांतियाँ होती हैं, हर राशि के लिए एक। इनमें सबसे जानी-पहचानी मकर संक्रांति है, जिस पर मैंने अलग से लिखा है।

अब नियम। चंद्र मास लगभग 29.5 दिन का होता है और सूर्य को एक राशि पार करने में लगभग 30 से 31 दिन लगते हैं। आम तौर पर हर चंद्र मास के भीतर ठीक एक संक्रांति पड़ जाती है।

लेकिन कभी-कभी एक पूरा चंद्र मास बीत जाता है और उसके भीतर कोई संक्रांति नहीं पड़ती, क्योंकि चंद्र मास सौर मास से छोटा है। जिस चंद्र मास में एक भी संक्रांति न पड़े, वही अधिक मास कहलाता है। उसे उसी नाम से पुकारा जाता है जो अगले शुद्ध मास का है, और उसके आगे अधिक लगा दिया जाता है।

तो अगर किसी साल आषाढ़ अधिक हो जाए, तो उस साल दो आषाढ़ होते हैं। पहला अधिक आषाढ़ और दूसरा निज आषाढ़, जिसे शुद्ध आषाढ़ भी कहते हैं। परंपरा का नियम यह है कि व्रत और पर्व निज मास में मनाए जाते हैं, अधिक मास में नहीं। इसीलिए ऐसे साल में गुरु पूर्णिमा लगभग तीस दिन आगे चली जाती है।

इसका व्यावहारिक मतलब एक ही है। पिछले साल की तारीख़ में ग्यारह दिन जोड़-घटाकर इस साल की तारीख़ नहीं निकाली जा सकती। हर साल यह जाँचना पड़ता है कि उस साल कोई अधिक मास है या नहीं और कौन सा है। यह गणना इंजन का काम है, याददाश्त का नहीं।

अमांत और पूर्णिमांत: दिन वही, नाम अलग

अब वह बात जो शायद ही कहीं लिखी मिलती है। भारत में मास गिनने के दो तरीक़े चलते हैं।

अमांत गणना में मास अमावस्या से अमावस्या तक चलता है। इसमें पहले शुक्ल पक्ष आता है और उसके बाद कृष्ण पक्ष। यह दक्षिण और पश्चिम भारत का प्रचलित तरीक़ा है। पूर्णिमांत गणना में मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक चलता है, और वहाँ कृष्ण पक्ष पहले आता है, शुक्ल पक्ष बाद में। यह उत्तर भारत का प्रचलित तरीक़ा है।

अब इसका असर देखिए। शुक्ल पक्ष की तिथियों में दोनों गणनाएँ एक ही मास का नाम देती हैं, क्योंकि दोनों में शुक्ल पक्ष पूर्णिमा पर ख़त्म होता है और उसी मास का हिस्सा रहता है। गुरु पूर्णिमा शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है, इसलिए वह दोनों गणनाओं में आषाढ़ की ही पूर्णिमा है। न दिन बदलता है, न नाम।

कृष्ण पक्ष में कहानी उलट जाती है। वही कृष्ण पक्ष अमांत में एक मास का दूसरा आधा होता है और पूर्णिमांत में अगले मास का पहला आधा।

इसीलिए जन्माष्टमी को दक्षिण में श्रावण कृष्ण अष्टमी कहा जाता है और उत्तर में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, जबकि दिन एक ही होता है। 2027 में जन्माष्टमी 25 अगस्त, बुधवार को है, और दोनों परंपराएँ उसी दिन पर सहमत हैं।

इसलिए यह याद रखने लायक़ है कि दो पंचांगों में अलग मास का नाम दिखे तो घबराने की ज़रूरत नहीं। पहले यह देखिए कि तिथि शुक्ल पक्ष की है या कृष्ण पक्ष की। कृष्ण पक्ष है तो नाम का फ़र्क़ अपेक्षित है और दिन वही रहेगा।

आषाढ़ पूर्णिमा और ऋतु

आषाढ़ वर्षा ऋतु की शुरुआत का मास है, और इस पर्व की जगह कैलेंडर में संयोग से नहीं पड़ी। जिस परंपरा में यह बना, उसमें बरसात के महीने यात्रा के महीने नहीं थे। साधु एक जगह रुकते थे, और वही चातुर्मास बना। एक जगह रुकना और पढ़ना-पढ़ाना साथ-साथ चलते हैं।

यह जोड़ मुझे इस पर्व की सबसे समझदार बात लगती है। सीखने का दिन उस मौसम की शुरुआत में रखा गया जिसमें आगे बढ़ना मुश्किल था और ठहरना स्वाभाविक था। तारीख़ किसी शुभ-अशुभ हिसाब से नहीं, ऋतु के व्यवहार से तय हुई।

इस दिन को कैसे पढ़ा जाए

मैं इसे भविष्य बताने वाले दिन की तरह नहीं देखता, और शास्त्र भी ऐसा दावा नहीं करते। यह एक तिथि है जिसे परंपरा ने एक अर्थ दे रखा है। उस अर्थ का उपयोग सीधा है और उसमें कुछ ख़रीदना नहीं पड़ता।

अगर आपको इस दिन का कोई व्यावहारिक उपयोग चाहिए तो वह यह है। जिन लोगों से आपने वाक़ई कुछ सीखा है, उनकी एक सूची बना लीजिए, और देखिए कि उनमें से कितनों को आपने कभी बताया कि उन्होंने क्या दिया। यह किसी गणना पर निर्भर नहीं है और किसी मुहूर्त की ज़रूरत भी नहीं रखता।

और अगर आप कुंडली की तरफ़ से देखना चाहते हैं तो सीखने की दिशा किसी एक दिन से नहीं, चलती हुई दशा से पढ़ी जाती है। उसकी पूरी संरचना विंशोत्तरी दशा में है और उसके भीतर की छोटी अवधियाँ अंतर्दशा में। किसी एक पूर्णिमा से ज़्यादा काम की जानकारी वहाँ मिलेगी।

गुरु पूर्णिमा 2027 में कब है?

18 जुलाई 2027, रविवार को। तिथि आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा है। यह तारीख़ इस साइट के गणना इंजन से निकाली गई है और तिथि से अलग से मिलाई गई है।

क्या गुरु पूर्णिमा का संबंध बृहस्पति ग्रह से है?

नहीं। यहाँ गुरु का अर्थ शिक्षक है और यह पर्व महर्षि वेद व्यास से जुड़ा है, इसीलिए इसका पुराना नाम व्यास पूर्णिमा है। पूर्णिमा तिथि चंद्रमा और सूर्य के अंतर से बनती है और उसमें बृहस्पति ग्रह की कोई भूमिका नहीं होती।

अधिक मास कैसे तय होता है?

जिस चंद्र मास के भीतर सूर्य की एक भी संक्रांति न पड़े, वह अधिक मास कहलाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चंद्र मास लगभग साढ़े उनतीस दिन का है और सौर मास तीस से इकतीस दिन का, इसलिए कभी-कभी एक पूरा चंद्र मास बिना संक्रांति के बीत जाता है।

अगर आषाढ़ अधिक मास हो तो गुरु पूर्णिमा किस आषाढ़ में मनेगी?

निज आषाढ़ में, यानी दूसरे वाले शुद्ध आषाढ़ में। परंपरा का सामान्य नियम यह है कि व्रत और पर्व निज मास में मनाए जाते हैं। इसी वजह से ऐसे साल में पर्व की तारीख़ लगभग तीस दिन आगे चली जाती है।

अमांत और पूर्णिमांत पंचांग अलग तारीख़ देते हैं क्या?

शुक्ल पक्ष के पर्वों में नहीं। वहाँ दिन भी एक होता है और मास का नाम भी। कृष्ण पक्ष के पर्वों में दिन तो एक ही रहता है, पर मास का नाम अलग हो जाता है, जैसे जन्माष्टमी को श्रावण कृष्ण अष्टमी और भाद्रपद कृष्ण अष्टमी दोनों कहा जाता है।

क्या पिछले साल की तारीख़ से इस साल की तारीख़ निकाली जा सकती है?

नहीं, और यही सबसे आम गलती है। चंद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटा है, और अधिक मास वाले साल में तारीख़ लगभग तीस दिन आगे कूद जाती है। हर साल की तारीख़ अलग से गणना करनी पड़ती है।

Aditya Sharma

लेखक

Aditya Sharma

मैंने Karma Jyotisha इसलिए बनाया क्योंकि ज्यादातर “AI ज्योतिष” साइट्स बस अंदाजा लगाते हैं। यह साइट वास्तविक विंशोत्तरी दशा और नक्षत्र गणना महर्षि पराशर के BPHS से करती है — गणना की गई, अंदाजा नहीं। मैं एक इंजीनियर हूं, पेशेवर ज्योतिषी नहीं — इसलिए इसे एक गणना-उपकरण मानता हूं, भविष्यवाणी नहीं — और यह हर पेज पर साफ़ लिखता हूं।

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