एक दोस्त ने पूछा, “मूल नक्षत्र सुनकर डर लगता है, क्या यह विनाश का नक्षत्र है?” निर्रिति देवी का नाम सुनकर यह सवाल आना स्वाभाविक है, लेकिन जड़ से जुड़ना और सत्य खोजना ही इस नक्षत्र का सबसे बड़ा गुण है।
मूल नक्षत्र की बुनियादी जानकारी
27 नक्षत्रों में मूल उननीसवां नक्षत्र है, जो धनु राशि में 0 से 13 डिग्री 20 मिनट तक फैला है। इसकी देवी निर्रिति हैं, जो विनाश या अभाव की देवी मानी जाती हैं, लेकिन यहां विनाश का मतलब जड़ों तक पहुंचकर पुराने ढांचे को हटाना है। इसका स्वामी ग्रह केतु है, इसका प्रतीक जड़ों का बंडल है, और यह राक्षस गण में आता है।
स्वभाव और आम गलतफहमी
निर्रिति के नाम से जुड़कर मूल नक्षत्र को अशुभ या विध्वंसक समझ लिया जाता है, जबकि असल गुण है जड़ तक पहुंचकर सत्य खोजने की निड़रता।
मूल वाले लोग सतही से संतुष्ट नहीं होते, वे हर चीज़ की तह में जाना चाहते हैं। इसी खोज के कारण कभी-कभी उनके जीवन में बड़े उथल-पुथल आते हैं, लेकिन यह उथल-पुथल अक्सर नई, ज्यादा सच्ची शुरुआत के रास्ते में बदलते हैं।
यह किस राशि और पदों में फैला है
मूल पूरी तरह धनु राशि के भीतर आता है। नक्षत्रों के चार पदों में बंटने की पूरी प्रणाली नक्षत्र पद और नवांश में समझाई गई है। जिनका गुरु मूल के पहले पद में है, उनके लिए गुरु मूल पद 1 वाला लेख बारीक अंतर दिखाता है।
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क्या मूल नक्षत्र अशुभ है?
नहीं, यह एक गलत धारणा है। निर्रिति विनाश की नहीं बल्कि जड़ तक पहुंचने की देवी हैं।
मूल नक्षत्र का स्वामी ग्रह कौन सा है?
केतु, जो इसमें आंतरिक खोज और अलगाव की प्रवृत्ति जोड़ता है।
मूल नक्षत्र किस राशि में आता है?
यह पूरी तरह धनु राशि के आरंभिक हिस्से में, 0 से 13 डिग्री 20 मिनट तक फैला है।
मूल नक्षत्र का प्रतीक क्या है?
जड़ों का बंडल, जो आधार तक पहुंचने की प्रवृत्ति का संकेत है।
क्या नक्षत्र से भविष्य का पता चलता है?
नहीं, यह राशि, लग्न और ग्रहों की स्थिति के साथ मिलकर ही पूरी तस्वीर बनता है।

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