हिंदी में ज्योतिष पढ़ने वाले ज़्यादातर लोगों ने अपना नक्षत्र सुना हुआ है। नाम रखने के समय पंडित जी ने बताया था, या किसी कुंडली के कागज़ पर लिखा दिखा था। पर यह क्या चीज़ है, यह कहाँ से निकलती है, और कुंडली में इसका काम क्या है, यह बहुत कम जगह साफ लिखा मिलता है।
यह पन्ना वही आधार है। पूरी सूची, हर नक्षत्र का विस्तार और स्वामी, पद का गणित, और वह एक बात जिसकी वजह से नक्षत्र पूरी विंशोत्तरी दशा की जड़ है। इसके बाद इस साइट पर हर नक्षत्र वाली पोस्ट इसी पन्ने से जुड़ेगी।
नक्षत्र की परिभाषा
निरयण राशिचक्र 360 अंश का है। उसे 27 बराबर भागों में बाँटिए। हर भाग 13 अंश 20 कला का होता है। यही एक भाग नक्षत्र कहलाता है।
यह वही चक्र है जिसे 12 भागों में बाँटने पर राशि बनती है। एक ही वृत्त पर दो अलग विभाजन चलते हैं, एक बारह का और एक सत्ताईस का, और दोनों साथ साथ काम करते हैं। इसीलिए किसी ग्रह की स्थिति बताने के लिए राशि और नक्षत्र दोनों की ज़रूरत पड़ती है।
ध्यान रखिए कि नक्षत्र आकाश में दिखने वाला तारा समूह नहीं है। तारा समूह से नाम ज़रूर आए हैं, पर गणना में नक्षत्र देशांतर का एक निश्चित खंड है, जिसकी सीमाएँ अंक से तय होती हैं।
रोहिणी नाम एक चमकीले तारे से आया है, पर रोहिणी नक्षत्र वृषभ के 10 से 23 अंश 20 कला का खंड है, चाहे उस समय वहाँ कुछ भी दिख रहा हो।
सत्ताईस ही क्यों
यह संख्या मनमानी नहीं है। चंद्रमा एक नाक्षत्र मास में, यानी लगभग 27.32 दिन में, पूरा चक्र लगा लेता है।
तो चंद्रमा हर दिन लगभग एक नक्षत्र पार करता है। दिन में लगभग 13 अंश 11 कला की औसत गति, और नक्षत्र की चौड़ाई 13 अंश 20 कला। यह लगभग बराबर है। इसी वजह से नक्षत्र को चंद्रमा का दैनिक विश्राम स्थल कहा गया है, और इसी वजह से पंचांग में हर दिन का एक नक्षत्र छपता है।
27 का एक और फायदा है। 27 चार से नहीं कटता, पर 27 गुणा 4 बराबर 108 होता है, और 108 राशिचक्र के नवांश खंडों की संख्या भी है। यही वह जगह है जहाँ नक्षत्र और नवांश एक दूसरे में बैठ जाते हैं, और आगे इसी पर बात होगी।
27 नक्षत्रों की पूरी सूची
नीचे हर नक्षत्र, उसका निरयण विस्तार, और उसका विंशोत्तरी स्वामी दिया गया है।
- अश्विनी, मेष 0 से 13 अंश 20 कला, स्वामी केतु
- भरणी, मेष 13 अंश 20 कला से 26 अंश 40 कला, स्वामी शुक्र
- कृत्तिका, मेष 26 अंश 40 कला से वृषभ 10 अंश, स्वामी सूर्य
- रोहिणी, वृषभ 10 से 23 अंश 20 कला, स्वामी चंद्र
- मृगशिरा, वृषभ 23 अंश 20 कला से मिथुन 6 अंश 40 कला, स्वामी मंगल
- आर्द्रा, मिथुन 6 अंश 40 कला से 20 अंश, स्वामी राहु
- पुनर्वसु, मिथुन 20 अंश से कर्क 3 अंश 20 कला, स्वामी गुरु
- पुष्य, कर्क 3 अंश 20 कला से 16 अंश 40 कला, स्वामी शनि
- आश्लेषा, कर्क 16 अंश 40 कला से 30 अंश, स्वामी बुध
- मघा, सिंह 0 से 13 अंश 20 कला, स्वामी केतु
- पूर्वा फाल्गुनी, सिंह 13 अंश 20 कला से 26 अंश 40 कला, स्वामी शुक्र
- उत्तरा फाल्गुनी, सिंह 26 अंश 40 कला से कन्या 10 अंश, स्वामी सूर्य
- हस्त, कन्या 10 से 23 अंश 20 कला, स्वामी चंद्र
- चित्रा, कन्या 23 अंश 20 कला से तुला 6 अंश 40 कला, स्वामी मंगल
- स्वाति, तुला 6 अंश 40 कला से 20 अंश, स्वामी राहु
- विशाखा, तुला 20 अंश से वृश्चिक 3 अंश 20 कला, स्वामी गुरु
- अनुराधा, वृश्चिक 3 अंश 20 कला से 16 अंश 40 कला, स्वामी शनि
- ज्येष्ठा, वृश्चिक 16 अंश 40 कला से 30 अंश, स्वामी बुध
- मूल, धनु 0 से 13 अंश 20 कला, स्वामी केतु
- पूर्वाषाढ़ा, धनु 13 अंश 20 कला से 26 अंश 40 कला, स्वामी शुक्र
- उत्तराषाढ़ा, धनु 26 अंश 40 कला से मकर 10 अंश, स्वामी सूर्य
- श्रवण, मकर 10 से 23 अंश 20 कला, स्वामी चंद्र
- धनिष्ठा, मकर 23 अंश 20 कला से कुंभ 6 अंश 40 कला, स्वामी मंगल
- शतभिषा, कुंभ 6 अंश 40 कला से 20 अंश, स्वामी राहु
- पूर्वा भाद्रपद, कुंभ 20 अंश से मीन 3 अंश 20 कला, स्वामी गुरु
- उत्तरा भाद्रपद, मीन 3 अंश 20 कला से 16 अंश 40 कला, स्वामी शनि
- रेवती, मीन 16 अंश 40 कला से 30 अंश, स्वामी बुध
स्वामियों का क्रम ध्यान से देखिए। केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध। यही नौ का क्रम तीन बार दोहराया गया है। अश्विनी से आश्लेषा तक एक चक्र, मघा से ज्येष्ठा तक दूसरा, और मूल से रेवती तक तीसरा। यह दोहराव संयोग नहीं है और इसी पर पूरी विंशोत्तरी दशा टिकी है।
पद, और नवांश से उसका जोड़
हर नक्षत्र चार बराबर पदों में बँटा है। एक पद 3 अंश 20 कला का होता है।
27 गुणा 4 बराबर 108। और नवांश विभाजन में भी हर राशि नौ भागों में बँटती है, 12 गुणा 9 बराबर 108। दोनों संख्याएँ एक हैं, और यह इसलिए है कि दोनों एक ही चीज़ हैं। नक्षत्र का एक पद और नवांश का एक खंड, दोनों 3 अंश 20 कला के हैं और दोनों की सीमाएँ एक ही जगह पड़ती हैं।
इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि आपके ग्रह का नक्षत्र पद जानने से उसका नवांश अपने आप निकल आता है। इसी वजह से पद वाली पढ़ाई गहरी होती है, क्योंकि वह राशि और नक्षत्र दोनों से नीचे उतरकर एक तीसरे स्तर पर जाती है। अश्विनी के पहले पद में चंद्रमा और मूल के पहले पद में गुरु इसी तरह की पढ़ाई के उदाहरण हैं।
जब कोई ग्रह राशि चक्र और नवांश चक्र दोनों में एक ही राशि में बैठ जाता है तो उसे वर्गोत्तम कहते हैं, और वह स्थिति पद की सीमाओं से ही तय होती है।
नक्षत्र स्वामी और विंशोत्तरी दशा
यहाँ नक्षत्र का असली काम सामने आता है।
जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, वह आपका जन्म नक्षत्र है। उस नक्षत्र का स्वामी ग्रह आपकी पहली महादशा का स्वामी होता है। और चंद्रमा उस नक्षत्र में कितना आगे बढ़ चुका था, यह तय करता है कि वह पहली महादशा कितनी बची हुई अवस्था में शुरू होती है।
मान लीजिए किसी का जन्म नक्षत्र रोहिणी है। रोहिणी का स्वामी चंद्र है, और चंद्र महादशा दस वर्ष की होती है। अगर जन्म के समय चंद्रमा रोहिणी का आधा भाग पार कर चुका था, तो जीवन की पहली महादशा चंद्र की होगी और उसमें पाँच वर्ष बचे होंगे। उसके बाद क्रम से मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध और आगे चलता रहेगा।
यानी आपके पूरे जीवन का दशा क्रम एक ही संख्या से निकलता है, जन्म के क्षण चंद्रमा का सटीक देशांतर। विंशोत्तरी दशा का पूरा 120 वर्ष का ढाँचा उसी एक बिंदु पर खड़ा है। यही कारण है कि नक्षत्र को केवल एक नाम मान लेना सबसे बड़ी चूक है।
सबसे बड़ी गलतफहमी: नक्षत्र किससे निकलता है
अब वह सुधार जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।
बहुत से लोग मानते हैं कि उनका नक्षत्र जन्म तारीख से या सूर्य की स्थिति से निकलता है, जैसे अंग्रेज़ी राशिफल में होता है। ऐसा नहीं है। जन्म नक्षत्र पूरी तरह चंद्रमा की स्थिति से निकलता है, और सूर्य का इससे कोई लेना देना नहीं है।
इसका एक सीधा परिणाम है जिसे लोग हल्के में लेते हैं। चंद्रमा दिन में लगभग एक नक्षत्र पार करता है, यानी एक पद लगभग छह घंटे में। तो एक ही दिन में सुबह और रात जन्मे दो बच्चों का नक्षत्र अलग हो सकता है, और पद तो अक्सर अलग होगा ही। जन्म का समय यहाँ उतना ही ज़रूरी है जितना जन्म की तारीख।
दूसरी उलझन पंचांग से आती है। पंचांग में जो नक्षत्र रोज़ छपता है, वह उस दिन आकाश में चंद्रमा का नक्षत्र है। वह आपका जन्म नक्षत्र नहीं है।
दोनों एक ही तरह से गिने जाते हैं, पर एक आज का है और दूसरा आपके जन्म क्षण का। दैनिक गणना की यही उलझन राहु काल में भी दिखती है, जहाँ लोग एक दैनिक नियम को कुंडली का स्थायी तथ्य समझ लेते हैं।
अभिजित, वह अट्ठाईसवाँ जिसे गिना नहीं जाता
यह बात शायद ही कहीं ठीक से लिखी मिलती है, और यह नक्षत्र प्रणाली की सबसे दिलचस्प बात है।
प्राचीन साहित्य में एक अट्ठाईसवाँ नक्षत्र मिलता है, अभिजित। वह उत्तराषाढ़ा और श्रवण के बीच बैठता है, मकर के 6 अंश 40 कला से 10 अंश 53 कला 20 विकला तक।
इसका गणित देखिए, क्योंकि यही असली बात है। अभिजित उत्तराषाढ़ा का आखिरी पद पूरा लेता है, यानी मकर 6 अंश 40 कला से 10 अंश तक।
और श्रवण से केवल 53 कला 20 विकला लेता है, जो श्रवण की कुल चौड़ाई का ठीक पंद्रहवाँ हिस्सा है। यानी अभिजित बराबर चौड़ाई वाला अट्ठाईसवाँ भाग है ही नहीं। वह दो पड़ोसी नक्षत्रों में से असमान टुकड़े लेकर बना एक विशेष खंड है।
इसीलिए उसे 27 वाली गिनती से बाहर रखा जाता है। 360 को 27 से बाँटने पर बराबर भाग मिलते हैं और 108 पद बनते हैं, जो नवांश से जुड़ जाते हैं। 28 से बाँटने पर वह पूरी सुंदर संरचना टूट जाती है। विंशोत्तरी दशा को भी नौ स्वामियों के तीन चक्र चाहिए, और 28 उसमें फिट नहीं होता।
पर अभिजित मुहूर्त परंपरा में आज भी ज़िंदा है, दिन के मध्य वाले उस छोटे शुभ खंड के नाम के रूप में। इसका मूल शास्त्रीय संदर्भ मैं याद से नहीं लिख रहा।
इसका सटीक अध्याय और श्लोक क्रमांक मैं यहाँ बिना ठोस प्रमाण के नहीं दूँगा, क्योंकि यह उद्धरण मैंने किसी मूल संस्कृत ग्रंथ में स्वयं जाँचकर पुष्ट नहीं किया है।
इतना कहा जा सकता है कि अभिजित की चर्चा वैदिक साहित्य में मिलती है, जहाँ नक्षत्रों की पुरानी गिनती में कभी अट्ठाईस का उल्लेख भी हुआ है, और परवर्ती फलित ग्रंथों ने इसे मुहूर्त-प्रयोग तक सीमित रखते हुए दशा-योग्य सत्ताईस की गिनती से बाहर रखा।
गंडांत, और उसे कैसे पढ़ना चाहिए
तीन जोड़ नक्षत्र प्रणाली में विशेष माने जाते हैं। रेवती का अंत और अश्विनी का आरंभ, आश्लेषा का अंत और मघा का आरंभ, ज्येष्ठा का अंत और मूल का आरंभ। इन तीनों जगह जल राशि खत्म होती है और अग्नि राशि शुरू होती है, और साथ ही एक नक्षत्र चक्र भी खत्म होकर दूसरा शुरू होता है। इन संधियों को गंडांत कहते हैं।
इन्हें डर के साथ बेचा जाता है, और वह अनुचित है। शास्त्रीय दृष्टि से गंडांत एक संधि बिंदु है, वह जगह जहाँ दो व्यवस्थाएँ जुड़ती हैं। संधि पर खड़ी चीज़ें अस्थिर होती हैं, यह सामान्य बात है।
जिस कुंडली में चंद्रमा गंडांत के पास हो, उसमें यह पढ़ा जाता है कि जीवन के कुछ हिस्से संक्रमण की माँग करते हैं, और यह पढ़ाई बाकी कुंडली के साथ तौली जाती है।
यह कोई श्राप नहीं है और इसका कोई उपाय बेचने की बात मैं नहीं करूँगा। जिस चीज़ को शास्त्र एक संवेदनशील बिंदु कहता है, उसे विपत्ति बना देना बाज़ार का काम है।
नक्षत्र क्या होता है?
निरयण राशिचक्र के 360 अंश को 27 बराबर भागों में बाँटने पर हर भाग 13 अंश 20 कला का होता है, और वही एक नक्षत्र है। यह देशांतर का एक निश्चित खंड है जिसकी सीमाएँ अंक से तय होती हैं, आकाश में दिखने वाला तारा समूह नहीं।
नक्षत्र 27 ही क्यों होते हैं?
चंद्रमा एक नाक्षत्र मास में लगभग 27.32 दिन में पूरा चक्र लगाता है, यानी लगभग एक दिन में एक नक्षत्र। इसके अलावा 27 को चार पदों से गुणा करने पर 108 मिलता है, जो नवांश खंडों की संख्या है, और विंशोत्तरी दशा के नौ स्वामियों के तीन पूरे चक्र भी 27 में ही बैठते हैं।
मेरा जन्म नक्षत्र किससे तय होता है?
पूरी तरह चंद्रमा से। जन्म के क्षण चंद्रमा जिस नक्षत्र खंड में था वही आपका जन्म नक्षत्र है। सूर्य या जन्म तारीख से इसका कोई संबंध नहीं है, और चूँकि चंद्रमा लगभग छह घंटे में एक पद पार करता है, जन्म का समय भी उतना ही ज़रूरी है जितनी तारीख।
नक्षत्र का विंशोत्तरी दशा से क्या संबंध है?
जन्म नक्षत्र का स्वामी ही जीवन की पहली महादशा का स्वामी होता है, और चंद्रमा उस नक्षत्र में कितना आगे बढ़ चुका था इससे तय होता है कि वह महादशा कितनी शेष अवधि के साथ शुरू होती है। पूरा 120 वर्ष का दशा क्रम इसी एक बिंदु से निकलता है।
पंचांग में छपा नक्षत्र और मेरा जन्म नक्षत्र एक ही हैं?
नहीं। पंचांग में रोज़ जो नक्षत्र छपता है वह उस दिन आकाश में चंद्रमा का नक्षत्र है। आपका जन्म नक्षत्र आपके जन्म क्षण का है और वह जीवन भर नहीं बदलता। गणना का तरीका दोनों में एक है और क्षण अलग है।
अभिजित नक्षत्र को 27 में क्यों नहीं गिना जाता?
क्योंकि वह बराबर चौड़ाई का भाग नहीं है। अभिजित उत्तराषाढ़ा का पूरा आखिरी पद और श्रवण का केवल पंद्रहवाँ हिस्सा लेकर बनता है, मकर के 6 अंश 40 कला से 10 अंश 53 कला 20 विकला तक। 28 भागों में बाँटने से 108 पद और नवांश का मेल टूट जाता है, इसलिए गणना 27 पर ही चलती है जबकि अभिजित मुहूर्त परंपरा में बना हुआ है।

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