पंचांग शब्द लगभग हर घर में सुना जाता है और लगभग कहीं नहीं समझाया जाता। ज़्यादातर लोगों के लिए यह वह किताब है जिसमें से पंडित जी कोई तारीख निकाल देते हैं। असल में पंचांग एक बहुत सीधी चीज़ है, और इसका नाम ही इसकी परिभाषा है। पंच का अर्थ पाँच है और अंग का अर्थ हिस्सा। पंचांग यानी पाँच अंगों वाला।
ये पाँच अंग हैं तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इनमें से हर एक किसी न किसी खगोलीय दूरी की गणना है। कोई भी अंग किसी परंपरा या राय पर आधारित नहीं है। सूर्य और चंद्रमा की स्थिति दे दीजिए, पाँचों अंग अपने आप निकल आते हैं।
मैं यह पोस्ट इसलिए लिख रहा हूँ कि पंचांग पढ़ने वाले ज़्यादातर लोग इन पाँच नामों को जानते हैं और इनमें से किसी की गणना नहीं जानते। और गणना जाने बिना वह गलती होती रहती है जो इस पोस्ट के छठे खंड में है।
तिथि: सूर्य और चंद्रमा के बीच की दूरी
तिथि वह पहला अंग है और सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला। इसकी परिभाषा एक वाक्य में आ जाती है। चंद्रमा के देशांतर में से सूर्य का देशांतर घटाइए, और जो अंतर बचे उसे बारह अंश से भाग दीजिए। जो संख्या मिलती है, वही तिथि है।
पूरा चक्र तीन सौ साठ अंश का है, इसलिए तीस तिथियाँ बनती हैं। अमावस्या के समय अंतर शून्य होता है और पूर्णिमा के समय एक सौ अस्सी अंश। शुक्ल पक्ष की पंद्रह तिथियाँ बढ़ते अंतर की हैं और कृष्ण पक्ष की पंद्रह घटते अंतर की।
यहाँ एक बात जो लोगों को चौंकाती है। तिथि की लंबाई हर बार अलग होती है। चंद्रमा की कक्षा अंडाकार है, इसलिए उसकी गति बदलती रहती है, और सूर्य की गति भी साल भर में एक जैसी नहीं रहती।
इसका नतीजा यह है कि एक तिथि कभी लगभग बीस घंटे की होती है और कभी लगभग छब्बीस घंटे की। यही असमानता क्षय तिथि और अधिक तिथि पैदा करती है, यानी वह स्थिति जब कोई तिथि किसी सूर्योदय को छूती ही नहीं, या दो सूर्योदय को छू लेती है।
वार: सूर्योदय से सूर्योदय तक
वार यानी सप्ताह का दिन। यह अकेला अंग है जो सूर्य या चंद्रमा की स्थिति से नहीं निकलता, और फिर भी यह पंचांग का हिस्सा है क्योंकि यह होरा चक्र से बनता है।
होरा एक घंटे का खंड है और दिन में चौबीस होरा होते हैं। हर होरा का एक स्वामी ग्रह होता है और उनका क्रम शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चंद्र है।
इस क्रम को चौबीस बार आगे बढ़ाइए तो पच्चीसवाँ होरा जिस ग्रह पर पड़ता है, वह अगले दिन का स्वामी बन जाता है। यही कारण है कि सप्ताह का क्रम रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि है, जो होरा क्रम से अलग दिखता है और उसी से निकलता है।
और अब वह बात जो सबसे कम बताई जाती है। ज्योतिष में वार सूर्योदय से शुरू होता है, आधी रात से नहीं। मंगलवार का ज्योतिषीय दिन मंगलवार के सूर्योदय पर शुरू होता है और बुधवार के सूर्योदय पर खत्म।
इसका सीधा असर यह है कि मंगलवार रात दो बजे जन्मे व्यक्ति का वार अभी भी मंगल है, हालाँकि घड़ी बुधवार दिखा रही है। जन्म कुंडली में वार पर आधारित हर गणना इसी नियम से चलती है।
नक्षत्र: चंद्रमा का सत्ताईस भागों वाला मार्ग
नक्षत्र तीसरा अंग है और जन्म कुंडली में यह सबसे भारी काम करता है। पूरा राशि चक्र तीन सौ साठ अंश का है और उसे सत्ताईस बराबर हिस्सों में बाँटा गया है। हर हिस्सा तेरह अंश बीस कला का है। चंद्रमा जिस हिस्से में हो, वही उस समय का नक्षत्र है।
चंद्रमा एक दिन में लगभग तेरह अंश चलता है, इसलिए वह हर दिन लगभग एक नक्षत्र पार करता है। यही कारण है कि दैनिक पंचांग में नक्षत्र बदलने का समय हर दिन छपता है।
नक्षत्र का सबसे बड़ा काम पंचांग के बाहर है। विंशोत्तरी दशा पूरी तरह जन्म के समय के चंद्र नक्षत्र से निकलती है। आपकी पहली महादशा कौन सी होगी और वह कितनी बाकी रहेगी, यह चंद्रमा उस नक्षत्र में कितना आगे बढ़ चुका था, इससे तय होता है।
पूरी गणना विंशोत्तरी दशा वाली पोस्ट में खुली हुई है, और एक दशा भीतर से कैसी चलती है यह देखने के लिए चंद्र महादशा वाली पोस्ट काम आती है।
योग: वह अंग जिसे लगभग कोई नहीं देखता
चौथा अंग योग है, और यह पाँचों में सबसे कम पढ़ा जाने वाला है। इसकी गणना सबसे अलग है। यहाँ सूर्य और चंद्रमा का अंतर नहीं लिया जाता। यहाँ दोनों के देशांतर जोड़े जाते हैं, और उस जोड़ को तेरह अंश बीस कला से भाग दिया जाता है। इससे सत्ताईस योग बनते हैं, जिनके नाम विष्कुंभ से लेकर वैधृति तक चलते हैं।
इस परिभाषा से एक दिलचस्प नतीजा निकलता है। चूँकि यहाँ दोनों की गति जुड़ रही है, योग का बदलाव तिथि से तेज़ चलता है। सूर्य लगभग एक अंश प्रतिदिन और चंद्रमा लगभग तेरह अंश प्रतिदिन चलता है, इसलिए जोड़ लगभग चौदह अंश प्रतिदिन बढ़ता है, और योग औसतन एक दिन से कुछ कम में बदल जाता है।
योग को मुहूर्त में देखा जाता है। कुछ योगों को शुभ आरंभ के लिए टाला जाता है और कुछ को स्वीकार किया जाता है। रोज़मर्रा की चर्चा में यह अंग लगभग गायब रहता है, और यही वजह है कि पाँच अंगों की सूची याद रखने वाले भी अक्सर चौथा नाम भूल जाते हैं।
करण: आधी तिथि
पाँचवाँ अंग करण है। करण आधी तिथि है, इसलिए एक चंद्र मास में साठ करण होते हैं। कुल ग्यारह करण हैं। सात चर करण हैं जो चक्र की तरह लौटते रहते हैं: बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि। चार स्थिर करण हैं जो महीने में सिर्फ़ एक एक बार आते हैं: शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न।
इनमें से विष्टि करण का दूसरा नाम भद्रा है, और यही वह शब्द है जिसकी वजह से करण साल में दो तीन बार अचानक चर्चा में आ जाता है।
रक्षा बंधन और होलिका दहन दोनों पूर्णिमा पर पड़ते हैं और दोनों पर हर साल यही सवाल उठता है। रक्षा बंधन 2027 वाली पोस्ट में भद्रा की पूरी गणना और उसका वह नियम है जो आम लेखों में नहीं आता।
सबसे आम गलत समझ: सूर्योदय का नियम
अब वह गलती जो मैं सबसे ज़्यादा देखता हूँ। लोग मान लेते हैं कि पंचांग में जो तिथि या नक्षत्र लिखा है, वह पूरे दिन वही रहता है।
ऐसा नहीं होता। पाँचों अंग लगातार चलते रहते हैं। दैनिक पंचांग में जो तिथि किसी दिन के नाम पर लिखी जाती है, वह वह तिथि है जो उस दिन सूर्योदय के समय चल रही थी। यह एक नामकरण का नियम है, कोई स्थिरता का दावा नहीं। वही तिथि सुबह दस बजे बदल सकती है और बाकी दिन अगली तिथि चलती रहेगी।
इसी वजह से पंचांग में हर अंग के आगे एक समय छपा होता है। “तृतीया 14:37 तक” का मतलब यही है कि उसके बाद चतुर्थी शुरू। जो लोग यह समय नहीं पढ़ते, वे मान बैठते हैं कि पूरा दिन तृतीया है, और फिर मुहूर्त की हर गणना गलत जगह से शुरू होती है।
दूसरी आम गलती यह है कि लोग किसी एक शहर का पंचांग सब जगह लगा देते हैं। तिथि, नक्षत्र, योग और करण के बदलने का क्षण पूरी पृथ्वी पर एक ही होता है, पर वह क्षण आपकी घड़ी पर आपके देशांतर के अनुसार अलग दिखेगा।
और सूर्योदय तो हर शहर में अलग है ही, इसलिए वार की सीमा भी हर शहर में अलग खिसकती है। राहु काल और अभिजित मुहूर्त दोनों सूर्योदय और सूर्यास्त से बनते हैं, इसलिए वे इस अंतर को सबसे साफ़ दिखाते हैं।
पंचांग और जन्म कुंडली एक ही गणित हैं
अंत में एक बात जो पूरी तस्वीर जोड़ देती है। पंचांग और जन्म कुंडली अलग विषय नहीं हैं। दोनों एक ही गणना पर खड़े हैं।
जन्म कुंडली एक तरह से आपके जन्म के क्षण का पंचांग है। जन्म का तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण उसी तरह निकाले जाते हैं जैसे किसी भी दिन के लिए निकाले जाते हैं। फ़र्क सिर्फ़ यह है कि कुंडली में लग्न और बारह भाव भी जुड़ जाते हैं, जो जन्म स्थान के अक्षांश और उस क्षण के समय से बनते हैं।
यही वजह है कि नक्षत्र दोनों जगह सबसे भारी काम करता है। पंचांग में वह दिन का लक्षण है और कुंडली में वह पूरी दशा प्रणाली की जड़ है। सूर्य संक्रांति की गणना पर मकर संक्रांति 2027 वाली पोस्ट देखिए, वहाँ यही सिद्धांत सौर वर्ष पर लागू है।
पंचांग के इन पाँच अंगों की गणना बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के किसी एक समर्पित अध्याय से नहीं आती, बल्कि सूर्य सिद्धांत जैसे ज्योतिष-गणित ग्रंथों और मुहूर्त परंपरा से आती है, जहाँ काल-गणना की यही पद्धति सदियों से इस्तेमाल होती रही है।
बीपीएचएस ग्रहों और भावों की व्याख्या करता है, पर पंचांग के पाँच अंगों की मूल परिभाषा ज्योतिष-गणित यानी सिद्धांत ग्रंथों का विषय है।
मैं यहाँ किसी एक अध्याय संख्या का अंदाज़ा नहीं लगा रहा, क्योंकि इस साइट का तरीका यही है कि जो संख्या लिखी जाए वह जाँची हुई हो।
पंचांग का शाब्दिक अर्थ क्या है?
पंच यानी पाँच और अंग यानी हिस्सा। पंचांग का अर्थ है पाँच अंगों वाला, और वे पाँच अंग हैं तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। हर अंग एक खगोलीय गणना है।
तिथि कैसे निकाली जाती है?
चंद्रमा के देशांतर में से सूर्य का देशांतर घटाकर अंतर निकाला जाता है और उसे बारह अंश से भाग दिया जाता है। तीन सौ साठ अंश के चक्र में इससे तीस तिथियाँ बनती हैं।
क्या तिथि पूरे दिन एक ही रहती है?
नहीं। पंचांग में किसी दिन के नाम पर वह तिथि लिखी जाती है जो उस दिन सूर्योदय के समय चल रही थी। वह तिथि दिन में किसी भी घंटे बदल सकती है, इसलिए पंचांग में हमेशा उसके साथ समाप्ति का समय छपता है।
वार कब से कब तक गिना जाता है?
ज्योतिष में वार सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक गिना जाता है, आधी रात से नहीं। इसलिए मंगलवार रात दो बजे का जन्म ज्योतिषीय रूप से अभी भी मंगलवार में गिना जाता है।
योग की गणना बाकी अंगों से कैसे अलग है?
योग में सूर्य और चंद्रमा के देशांतर जोड़े जाते हैं और जोड़ को तेरह अंश बीस कला से भाग दिया जाता है, जिससे सत्ताईस योग बनते हैं। बाकी अंगों में अंतर लिया जाता है, इसलिए योग की चाल सबसे तेज़ पड़ती है।
पंचांग का जन्म कुंडली से क्या संबंध है?
जन्म कुंडली आपके जन्म क्षण का पंचांग ही है, जिसमें लग्न और बारह भाव जुड़ जाते हैं। जन्म का चंद्र नक्षत्र विंशोत्तरी दशा की पूरी समय रेखा तय करता है, इसलिए यह अंग दोनों जगह सबसे भारी काम करता है।

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