तिथि क्या है: चाँद और सूरज के बीच बारह अंश

पंचांग में सबसे ज़्यादा दिखने वाला शब्द तिथि है, और सबसे ज़्यादा गलत समझा जाने वाला भी यही है। ज़्यादातर लोग तिथि को दिन का दूसरा नाम मान लेते हैं। कैलेंडर में 25 तारीख की तरह पंचांग में सप्तमी, बस इतना।

यह मान लेने के बाद हर उलझन पैदा होती है। एक साल में एकादशी दो बार क्यों आ गई। इस बार चतुर्थी गायब कैसे हो गई। व्रत की तारीख दो पंचांगों में अलग क्यों है। इन सब का जवाब एक ही जगह है, और वह जगह आसमान का सीधा-सादा गणित है।

तो तिथि को खोलकर देखते हैं। यह क्या है, यह घटती-बढ़ती क्यों है, और यह जानने से पंचांग पढ़ना कैसे बदल जाता है।

तिथि क्या है: चाँद और सूरज के बीच बारह अंश

तिथि की परिभाषा एक वाक्य में है

तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच के कोणीय फासले का बारह अंश का टुकड़ा है।

अमावस्या पर दोनों एक ही जगह होते हैं, फासला शून्य। जैसे-जैसे चंद्रमा आगे बढ़ता है, फासला बढ़ता जाता है। जब यह फासला बारह अंश हो जाता है, पहली तिथि यानी प्रतिपदा पूरी हो गई। चौबीस अंश पर द्वितीया पूरी। इसी तरह चलते-चलते एक सौ अस्सी अंश पर पूर्णिमा आती है, जब दोनों आमने-सामने होते हैं, और तीन सौ साठ अंश पर फिर अमावस्या।

तीन सौ साठ को बारह से भाग दीजिए तो तीस मिलते हैं। यही तीस तिथियाँ एक चंद्र मास बनाती हैं, पंद्रह शुक्ल पक्ष की और पंद्रह कृष्ण पक्ष की।

ध्यान दीजिए कि इस पूरी परिभाषा में सूर्योदय, दिन या घड़ी का कोई ज़िक्र नहीं है। तिथि मूल रूप से एक कोण है। घड़ी का समय उसका नतीजा है।

तिथि की लंबाई बदलती क्यों रहती है

अगर सूर्य और चंद्रमा दोनों एक जैसी रफ्तार से चलते तो हर तिथि की लंबाई एक बराबर होती। पर वे ऐसा नहीं करते।

चंद्रमा की औसत दैनिक गति लगभग तेरह अंश दस कला है। सूर्य की औसत दैनिक गति लगभग उनसठ कला है। दोनों को घटाइए तो चंद्रमा हर दिन सूर्य से लगभग बारह अंश ग्यारह कला आगे निकलता है। बारह अंश का फासला बनाने में इसे लगभग तेईस घंटे सैंतीस मिनट लगते हैं। यही तिथि की औसत लंबाई है।

पर यह औसत है। चंद्रमा की कक्षा दीर्घवृत्ताकार है, इसलिए वह कभी पृथ्वी के पास होता है और तेज़ चलता है, कभी दूर होता है और धीमा चलता है। सूर्य के साथ भी यही होता है, हल्के पैमाने पर। नतीजा यह कि असली तिथि लगभग उन्नीस घंटे से लेकर लगभग छब्बीस घंटे तक की हो सकती है।

यहीं से सारा मामला दिलचस्प हो जाता है।

क्षय तिथि और वृद्धि तिथि, यानी तिथि का गायब होना और दोहराया जाना

पंचांग की परंपरा में दिन की पहचान उस तिथि से होती है जो सूर्योदय के समय चल रही हो। यह एक व्यावहारिक नियम है क्योंकि लोगों को दिन चाहिए, कोण नहीं।

अब सोचिए कि एक तिथि उन्नीस घंटे की है और वह सूर्योदय के ठीक बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले खत्म हो गई। उस तिथि ने किसी भी सूर्योदय को नहीं छुआ। पंचांग में वह तिथि उस महीने में दिखेगी ही नहीं। इसे क्षय तिथि कहते हैं।

उल्टा भी होता है। एक तिथि छब्बीस घंटे की है और वह एक सूर्योदय से पहले शुरू होकर अगले सूर्योदय के बाद तक चली। उसने दो सूर्योदय छू लिए। पंचांग में वही तिथि लगातार दो दिन दिखेगी। इसे वृद्धि तिथि या अधिक तिथि कहते हैं।

तो जब कोई कहता है कि इस साल एकादशी दो दिन है, वह गलत नहीं कह रहा। वह वृद्धि तिथि देख रहा है। और जब कोई कहता है कि इस साल चतुर्थी है ही नहीं, वह क्षय तिथि देख रहा है। दोनों हालात हर कुछ महीनों में आते हैं और दोनों गणित की सामान्य बात हैं।

यही वह जगह है जहाँ दो पंचांग अलग हो जाते हैं

अब सबसे उपयोगी बात। हर व्रत का निर्णय एक ही नियम से नहीं होता, और यही असली कारण है कि दो भरोसेमंद पंचांग एक ही व्रत की दो तारीखें दे देते हैं।

कुछ व्रत सूर्योदय की तिथि से तय होते हैं। कुछ मध्याह्न की तिथि से, जैसे गणेश चतुर्थी। कुछ प्रदोष काल की तिथि से, यानी सूर्यास्त के बाद का हिस्सा। और जन्माष्टमी जैसा व्रत निशीथ काल यानी आधी रात की तिथि से तय होता है।

अगर तिथि दोपहर तीन बजे बदल रही है, तो सूर्योदय वाला नियम एक दिन देगा और प्रदोष वाला नियम अगला दिन। दोनों पंचांग सही गणना कर रहे हैं। वे अलग-अलग निर्णय-बिंदु पर देख रहे हैं।

यह समझ लेने के बाद पंचांग की बहस खत्म हो जाती है। सवाल यह नहीं रहता कि कौन सही है, सवाल यह हो जाता है कि इस व्रत के लिए शास्त्र ने कौन सा निर्णय-बिंदु दिया है। मुहूर्त के दूसरे हिस्से, जैसे राहु काल और अभिजित मुहूर्त, इसी तरह अलग-अलग आधारों पर निकलते हैं।

तिथि पंचांग के बाकी अंगों से कैसे जुड़ती है

पंचांग के पाँच अंग हैं और तिथि उनमें से एक है। बाकी चार हैं वार, नक्षत्र, योग और करण। इन पाँचों का पूरा ढाँचा मैंने पंचांग के पाँच अंगों वाले लेख में खोला है।

दिलचस्प बात यह है कि पाँच में से तीन अंग एक ही कच्चे माल से बनते हैं, सूर्य और चंद्रमा की देशांतर स्थिति से।

तिथि दोनों के अंतर से बनती है, बारह अंश प्रति टुकड़ा। योग दोनों के जोड़ से बनता है, तेरह अंश बीस कला प्रति टुकड़ा। करण तिथि का आधा हिस्सा है, यानी छह अंश। नक्षत्र अकेले चंद्रमा की स्थिति से बनता है, तेरह अंश बीस कला प्रति टुकड़ा।

यानी पंचांग कोई अलग-अलग सूचनाओं की सूची नहीं है। वह दो पिंडों की स्थिति को चार अलग-अलग तरीकों से काटकर देखने का तरीका है। एक बार यह दिख जाए तो पंचांग रटने की चीज़ नहीं रह जाता।

सबसे आम गलतफहमी: तिथि पूरे दिन एक रहती है

यह वह गलती है जो सबसे ज़्यादा नुकसान करती है। लोग मान लेते हैं कि जिस दिन पंचांग में सप्तमी लिखी है, उस पूरे दिन सप्तमी है।

ऐसा लगभग कभी नहीं होता। तिथि किसी भी घड़ी के समय शुरू और खत्म हो सकती है, सुबह साढ़े दस बजे, रात दो बजे, दोपहर तीन बजकर सैंतालीस मिनट पर। पंचांग जो दिखाता है वह सूर्योदय की तिथि है, और उसके नीचे छोटे अक्षरों में उसके खत्म होने का समय भी लिखा होता है। वही छोटा अक्षरों वाला हिस्सा असली जानकारी है।

इसका सीधा असर यह है कि अगर आप किसी काम के लिए तिथि देख रहे हैं, तो आपको समय भी चाहिए, सिर्फ दिन नहीं।

और वह समय आपके शहर के हिसाब से चाहिए, क्योंकि सूर्योदय हर देशांतर पर अलग होता है और तिथि का बदलना घड़ी के जिस पल पर होता है वह भारत भर में एक ही होता है। इन दोनों का मेल हर शहर के लिए अलग तस्वीर बनाता है।

वह बात जो कम कही जाती है

तिथि पूरी तरह चंद्रमा और सूर्य के सापेक्ष कोण पर टिकी है, इसलिए वह अयनांश से प्रभावित नहीं होती।

यह छोटी सी बात बहुत काम की है। राशि और नक्षत्र निकालने के लिए आपको अयनांश चुनना पड़ता है, और लाहिड़ी, रमन या कृष्णमूर्ति में से कौन सा चुना, इससे नतीजा हिलता है। तिथि में यह समस्या है ही नहीं, क्योंकि वह दो पिंडों का आपसी फासला है और फासला किसी भी शून्य-बिंदु से मापने पर वही रहता है।

इसीलिए तिथि पंचांग का सबसे स्थिर अंग है। दो पंचांग तिथि के क्षण पर लगभग कभी नहीं भिड़ते। वे इस बात पर भिड़ते हैं कि उस क्षण को किस दिन गिना जाए, और वह निर्णय का सवाल है, गणना का नहीं।

दूसरी कम कही जाने वाली बात यह है कि चंद्रमा की गति से बनने वाला यही ढाँचा चंद्र महादशा जैसी दशा गणना का भी आधार है। विंशोत्तरी दशा जन्म के समय चंद्रमा की नक्षत्र स्थिति से शुरू होती है। यानी पंचांग और दशा दोनों एक ही पिंड की चाल पर खड़े हैं, बस काटने का तरीका अलग है।

व्यावहारिक निष्कर्ष

तिथि को दिन मत मानिए, कोण मानिए। पंचांग में सिर्फ तिथि का नाम मत देखिए, उसके खत्म होने का समय देखिए। किसी व्रत की तारीख पर बहस हो तो पहले पूछिए कि उस व्रत का निर्णय-बिंदु सूर्योदय है, मध्याह्न है, प्रदोष है या निशीथ। और अपने शहर के लिए गणना करवाइए, किसी राष्ट्रीय समय को अपने ऊपर मत चढ़ाइए।

यह साइट यही करती है। गणना करती है और शास्त्र का नियम बताती है। किसी नतीजे की गारंटी नहीं देती और किसी उपाय की ज़रूरत नहीं बताती।

स्रोत के तौर पर, चंद्रमा और सूर्य की मध्यम (औसत) गति सूर्य सिद्धांत के पहले अध्याय, मध्यमाधिकार, में दी गई है, और उसी से तिथि की औसत लंबाई निकलती है।

तिथि की बारह अंश वाली परिभाषा और उसकी वास्तविक, दिन-प्रतिदिन की गणना दूसरे अध्याय, स्पष्टाधिकार, में है, जहाँ चंद्रमा और सूर्य की स्पष्ट यानी सत्य गति के अंतर से तिथि निकाली जाती है।

बर्गेस के मानक अंग्रेज़ी अनुवाद में यह गणना श्लोक 66 के आसपास मिलती है, अनुवादक की अपनी टिप्पणी में भी इसी श्लोक का हवाला दिया गया है। क्षय और वृद्धि तिथि का व्यवहार तथा व्रत-निर्णय के अलग-अलग काल निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु जैसी निर्णय-पुस्तकों का विषय हैं।

तिथि और दिन में क्या फर्क है?

दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक का समय है और उसकी लंबाई लगभग चौबीस घंटे रहती है। तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच बारह अंश के फासले का टुकड़ा है और उसकी लंबाई लगभग उन्नीस से छब्बीस घंटे के बीच बदलती रहती है। दोनों अलग इकाइयाँ हैं।

एक तिथि कितने घंटे की होती है?

औसतन लगभग तेईस घंटे सैंतीस मिनट, क्योंकि चंद्रमा हर दिन सूर्य से लगभग बारह अंश ग्यारह कला आगे निकलता है। असली लंबाई चंद्रमा की उस समय की गति पर निर्भर करती है और लगभग उन्नीस से छब्बीस घंटे के बीच घटती-बढ़ती है।

क्षय तिथि का मतलब क्या है?

जब कोई तिथि इतनी छोटी पड़ जाए कि वह किसी भी सूर्योदय को न छू सके, तो वह पंचांग में उस महीने दिखती ही नहीं। इसे क्षय तिथि कहते हैं। उल्टी स्थिति में तिथि दो सूर्योदय छू लेती है और लगातार दो दिन दिखती है, जिसे वृद्धि तिथि कहते हैं।

दो पंचांग एक ही व्रत की अलग तारीख क्यों देते हैं?

क्योंकि हर व्रत का निर्णय-बिंदु अलग है। कुछ सूर्योदय की तिथि से तय होते हैं, कुछ मध्याह्न से, कुछ प्रदोष काल से और कुछ निशीथ काल से। अगर तिथि दिन के बीच बदल रही हो तो अलग नियम अलग दिन दे देते हैं, और दोनों गणनाएँ सही होती हैं।

क्या तिथि अयनांश से बदलती है?

नहीं। तिथि सूर्य और चंद्रमा के आपसी फासले से बनती है, और फासला किसी भी शून्य-बिंदु से मापने पर एक ही रहता है। इसीलिए राशि और नक्षत्र के मुकाबले तिथि पंचांग का सबसे स्थिर अंग है।

पंचांग में तिथि का समय क्यों लिखा होता है?

क्योंकि तिथि पूरे दिन नहीं टिकती। पंचांग जो नाम दिखाता है वह सूर्योदय के समय चल रही तिथि का है, और साथ लिखा समय बताता है कि वह तिथि कब समाप्त होगी। किसी काम के लिए तिथि देखते समय वही समय असली जानकारी है।

Aditya Sharma

लेखक

Aditya Sharma

मैंने Karma Jyotisha इसलिए बनाया क्योंकि ज्यादातर “AI ज्योतिष” साइट्स बस अंदाजा लगाते हैं। यह साइट वास्तविक विंशोत्तरी दशा और नक्षत्र गणना महर्षि पराशर के BPHS से करती है — गणना की गई, अंदाजा नहीं। मैं एक इंजीनियर हूं, पेशेवर ज्योतिषी नहीं — इसलिए इसे एक गणना-उपकरण मानता हूं, भविष्यवाणी नहीं — और यह हर पेज पर साफ़ लिखता हूं।

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